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तबाही वाली रात: जिंदगी बचाने को 32 किमी दौड़े

Mon, 24 Jun 2013 12:18 PM IST
देहरादून/ब्यूरो
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केदारनाथ में 16 जून को तबाही की शुरुआत। गोरखपुर, यूपी से आई हेमवंती का परिवार तेज बारिश में केदार बाबा के दर्शन कर मंदिर से उतरा। थोड़ी देर आराम के लिए रुके तो थका शरीर यहीं रात गुजराने के लिए जवाब देने लगा।
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रुकने का ठिकाना तलाश रहे थे कि पता लगा कि तेज बारिश से तबाही मच सकती है। पता लगा कि ऊपर के कई इलाके खाली करवा दिए गए हैं।

अभी भूला नहीं है तबाही का मंजर

तेज बहाव में मंदिर के पास कई लोगों के बहने की खबर मिली तो रोंगटे खड़े हो गए। यहां से उठे और देर शाम पैदल ही गौरीकुंड की तरफ चल दिए। रात होने लगी लेकिन पीछे से दौड़कर आते लोगों की चीख सुनाई दी तो हमने भी दौड़ना शुरू कर दिया। लेकिन आगे तेज बारिश से गौरीकुंड का रास्ता नहीं बचा था।

पहाड़ी से गिरने का डर
पहाड़ों पर बारिश में चलते रहे। खौफनाक आवाज और तेज बारिश में पहाड़ी से गिरने का डर। 55 साल की हेमवंती जान बचाने को अन्य लोगों संग पहाड़ चढ़ने लगी। पहली पहाड़ी से नीचे उतरे तो पानी के तेज बहाव के साथ झरना बह रहा था। आंखों के सामने कई लोग बहे।
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लेकिन पीछे दौड़ रही मौत के खौफ से सभी ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा, और साथ में आए कुछ लड़कों ने हाथों में उठाकर पार करवाया। डर का खौफ ऐसा कि बिना चप्पल दूसरी पहाड़ी पार की। यहां भी पानी के तेज बहाव को डरकर पार किया।

आंखों के सामने बह गए
हेमवंती, साथ में आई कौशल्या, दुर्गा प्रसाद तो पार कर गए। लेकिन इनके बाद साथ आए पंडित जी और पास के गांव के चौधरी तेज बहाव में आंखों के सामने बह गए। एक पल में वह इतनी दूर जा चुके थे कि अंधेरे में कुछ पता नहीं लगा। कुछ मिनट यहां रुके, लेकिन जिंदगी बचाने को फिर से अगली पहाड़ी पर चढ़ाई शुरू कर दी।

इससे उतरे तो सुबह हो चुकी थी। इनके दल में एक साथ चल रहे करीब 12 लोग गौरीकुंड से कुछ आगे आ गए थे। हिम्मत से सभी इतने टूट चुके थे कि गौरीकुंड से दो किमी आगे चलने के बाद शरीर नहीं चला। थककर जमीन पर बैठ गए। इतने में ही पीछे गौरीकुंड और केदारनाथ में सब कुछ तबाह हो चुका था। तबाही के बाद ये जिस पहाड़ पर थे, उससे आगे चलने की जगह नहीं बची थी।

कुछ रोटियां दी
थकान के बाद भूख प्यास में केवल बारिश का बहता पानी पिया। सोमवार और मंगलवार दोपहर तक खाना नहीं मिलने से जान खींची जा रही थी। मंगलवार की शाम एक पांडा ने कुछ रोटियां दी। दो-दो कर खाई तो उम्मीद लगी जिंदगी के कुछ पल और बढ़ गए, लेकिन उठकर चलने की हिम्मत नहीं।

गुरुवार को दोपहर के वक्त सेना ने खाने के कुछ पैकेट गिराए। इनमें गिनती के पैकेट उठा सके, बाकी इतनी दूर गिरे की उठाने जाते तो जान निकल जाती। इससे बृहस्पतिवार तक जिंदा रहे। सेना की टीम पहुंची तो लगा मानो नई जिंदगी मिली गई है। उन्होंने बताया कि सेना यहां से उनको हेलीकाप्टर से गुप्तकाशी तक ले आई थी।

एंबुलेंस में बैठाया
यहां पेटभर खाना मिल गया। रविवार को इनके साथ घायलावस्था में पहुंची चंद्रा देवी निवासी गुड़गांव को स्ट्रेचर से और शिव कुमारी निवासी बस्ती, यूपी को गोद में उठाकर चॉपर से उतार एंबुलेंस में बैठाया गया। दोनों को उपचार के लिए सीधे मैक्स हास्पिटल भेज दिया गया। शिव कुमारी का पैर टूटा था, जबकि चंद्रा देवी का जख्म कई दिनों पुराना होने से गल सा गया था। ये ठीक से कुछ बोल नहीं पा रही थी।
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