दोपहर के बाद का समय है। उत्तर प्रदेश स्थित एक छोटा सा अस्थाई घर। यह घर सामान्य घरों से काफी अलग है।
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42 वर्षीय रेहाना और सात लोगों का परिवार मिट्टी के कच्चे चूल्हे पर रात के लिए खाना बनाने में व्यस्त है। यह नजारा है पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के एक दंगा-राहत शिविर का।
उन्होंने मुझे पानी के लिए पूछा। उनकी आवाज में बेइंतिहा दर्द साफ झलक रहा था।
रेहाना कहती हैं, "हमें छह महीने पहले अपना घर घर छोडना पडा। उसके बाद से हम घूमंतू की तरह जी रहे हैं। घर छोडते समय हम केवल अपने बच्चों को ही ला पाए। अब हमारी कोई पहचान नहीं है और न ही इस पहचान का कोई प्रमाण। हमें अब तक कोई मदद नहीं मिली है।दंगा-राहत शिविर"
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सरकारी अस्पताल में चार महीने रहने के बाद उनके पति अब वापस आ चुके हैं लेकिन उनके पास कोई रोजगार नहीं है।
बेघर और बेकाम
रेहाना का गाँव इस दंगा राहत शिविर से ज्यादा दूर नहीं है। पिछले साल हुए दंगे में उनके पति बुरी तरह घायल हो गए थे। वो स्वस्थ तो हो गए लेकिन उन्हें मिस्त्री के काम के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया।
इस शिविर में 300 से ज्यादा परिवार अस्थाई घरों में रह रहे हैं।
रेहाना के परिवार जैसे इस शिविर और भी कई परिवार हैं जिनके लिए आम चुनाव ने विस्थापन की याद को ताजा कर दिया है। एक ऐसी याद जिसे वे बिल्कुल भुला देना चाहते हैं।
76 वर्षीय अख्तरान विधवा हैं। उनके परिवार में नौ लोग हैं। उनके दो बेटे बेरोजगार हैं। उनके घर को भी उनके पैतृक गाँव कुटबा में छह महीने पहले उपद्रवियों की भीड ने जला दिया था।
बदले में मुझे क्या मिला ?
अख्तरान कहती हैं, "मैंने दसियों लोक सभा चुनाव में वोट दिया है। इसके बदले
में मुझे मिला क्या, दर बदर की ठोकर और निराशा। मैं क्यों वोट दूँ और कैसे
दूँ जब मुझे मेरे घर से अपनी एक तस्वीर या कागजात भी नहीं लाने दिया गया।"
इस इलाके में अब से एक महीने से भी कम समय में आम चुनाव के लिए मतदान होने वाले हैं।
हालाँकि
हजारों बेघर दंगा-पीडितों को आर्थिक मदद दी गई है। उन्हें नई जगह बसाया
गया है। लेकिन अभी भी हजारों ऐसे हैं जिन्हें अपनी बारी का इंतजार है।
आधिकारिक आंकडों के अनुसार दंगे की वजह से 50,000 से ज्यादा लोग विस्थापित
हुए थे।
उत्तर प्रदेश की सरकार और भारत का चुनाव आयोग कोशिश कर रहा
है कि राहत शिविरों में रह रहे लोगों को किसी तरह का पहचान पत्र उपलब्ध
कराया जाए।
चुनाव पहचान पत्र
इस जिले के जिलाधिकारी और इस संवेदनशील संसदीय क्षेत्र में मुख्य चुनाव अधिकारी कौशल राज शर्मा कहते हैं, "नौ मार्च, 2013 तक 3000 से ज्यादा लोगों को चुनाव पहचान पत्र दिया जा चुका है। नौ मार्च को मतदान सूची में नाम दर्ज कराने की आखिरी तारीख थी। खास बात यह कि इन लोगों को बिना किसी खास दस्तावेज के मतदान पहचान पत्र दिए गए।"
शर्मा कहते हैं, "हमने इन लोगों को समझाने की कोशिश की थी कि वे अपने गाँवों में वापस चले जाएँ। नतीजन 69 फीसदी लोग वापस जा चुके हैं। 40 फीसदी लोग अभी वापस नहीं जा पाए हैं।"
इसके बावजूद रेहाना जैसे कई पीडितों के पास अभी भी कोई पहचान पत्र नहीं है।
इनमें से कुछ लोगों ने एक खास नेता के खिलाफ अपनी नाराजगी खुल कर जाहिर की। इन लोगों ने तय किया है कि वो इस बार वोट नहीं देंगे।
वे तब आए जब हम सब कुछ खो चुके थे
शिविर के पास ही स्थित सिसौली गाँव के निवासी अमन पर अज्ञात लोगों की भीड ने तब हमला किया जब वह खेतों में काम कर रहे थे।
जब वह अपना सरकारी अस्पताल में अपना इलाज करा रहे थे तभी उनका परिवार इस शिविर में रहने के लिए चला आया था।
अमन
कहते हैं, "हमें राजनेताओं पर कोई भरोसा नहीं रहा। वे हमें कोई मदद या
भरोसा दिलाने में असफल रहे हैं।
वे तब आए जब हम सब कुछ खो चुके थे। मैं तो
चुनाव पहचान पत्र के लिए आवेदन नहीं करने जा रहा।"
एक सरकारी पैनल की रिपोर्ट में कहा गया है कि कम से कम 12 बच्चों की, जिनकी उम्र 15 साल से कम थी, इन राहत शिविरों में मौत हो चुकी थी। इन शिविरों में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं और सफाई का अभाव है।
ये लोग उन हजारों में लोगों में हैं जो पिछले साल सितंबर में हुए साम्प्रदायिक दंगों में बेघर हुए थे।
कई लोग मानते हैं कि यह दंगा पिछले एक दशक में देश में हुआ सबसे बडा दंगा है।
भारतीय राज्यों में उत्तर प्रदेश की जनसंख्या सबसे अधिक ज्यादा है। साल 1992 में उग्र हिन्दुओं ने जब बाबरी मस्जिद तोड दी थी तो प्रदेश में व्यापक दंगे हुए थे।