जहरीले सांपों के जहर को अब बेअसर किया जा सकेगा। इसके लिए गोरखपुर विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञान विभाग के प्रवक्ता डॉ. उमेश यादव ने रासायनिक कंपाउंड तैयार कर लिया है।
इस कंपाउंड का सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीडीआरआई) में अभी परीक्षण होना है। उसके बाद इसे पेटेंट करा कर दवा निर्माता कंपनियों के मार्फत इसे बाजार में उतारा जाएगा।
सांप के डंसने से होने वाली मौत पर नियंत्रण के लिहाज से यह दवा काफी लाभदायक होगी। डॉ. यादव बताते हैं कि सांप के डंसने से मिचली आती है, उल्टी होने लगती है, ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है, डंसने वाले स्थान पर सूजन आ जाती है, खून के थक्का बनने की प्रक्रिया थम जाती है। घबराहट होने लगती।
इसमें हार्ट फेल होने का खतरा बढ़ जाता है। ऐसा विष के एंजाइम ‘फास्को लिपेस ए-2’ के चलते होता है। ऐसे में इन सारी चीजों पर काबू पाने के लिए दो एक्टिव साइट का पता लगाया गया है।
एक से जहां जलन कम होती है तो दूसरे एक्टिव साइट से खून के थक्का बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
उन्होंने बताया कि प्रयोग से पता चला है कि ‘पायराजोलो (3,4-डी) पिरीमिडीन’ नामक रसायन सर्प डंस से होने वाली जलन को कम करने और खून का थक्का बनाने में कारगर है।
डॉ. यादव ने बताया कि दो पायरो जोलो 3, 4-डी पिरीमिडीन को ट्राई मेथिलीन लिंकर से मिलाया गया तो पता चला कि यह कंपाउंड फास्को लिपेस ए-2 (सांप का जहर) की कार्यविधि को रोक देता है। उन्होंने बताया कि स्थापित सैद्धांतिक विधि से सीडीआरआई में कंपाउंड तैयार है। उसके रासायनिक परीक्षण जल्द होने की उम्मीद है।
बायो फिजिक्स युवा वैज्ञानिक ने बताया कि इस कंपाउंड का प्रयोग ‘रसेल वाइपर’ पर किया गया जो कारगर साबित हुआ है। उसके बाद गेहुंअन और करैत पर भी प्रयोग चल रहा है। उन्होंने दावे के साथ कहा कि इन दोनों सापों के विष पर भी यह कारगर होगा।
अब तक सांप के विष को बेअसर करने की दवा नहीं बनी है। विष के असर को कम करने के लिए एंटी स्नैक वेनम का इस्तेमाल किया जाता है। इसके लिए घोड़े के सीरम को सांप के विष में डाल कर एंटीबॉडी तैयार किया जाता है।
ऐसे में इसे तैयार करने में भी दिक्कत आती है और महंगा भी होता है। इस दृष्टि से नई दवा के तैयार होने पर सर्प दंश से होने वाली मौत पर काफी हद तक नियंत्रण हो पाएगा।
उन्होंने बताया कि दो साल की मशक्कत के बाद यह कंपाउंड तैयार हुआ है। उनका शोध नीदरलैंड से प्रकाशित बायो फिजिक्स के प्रतिष्ठित जनरल में हाल ही में प्रकाशित हुआ है।
विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. मिहिर राय चौधरी के निर्देशन में डॉ. यादव ने यह शोध किया है। इसके लिए उन्हें विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग नई दिल्ली द्वारा वित्तीय सहायता प्राप्त हुई है।