लोकचेतना के जरिए कविता को किया नया
कविता के क्षेत्र में भारतेंदु वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने लोक चेतना के माध्यम से कविता को नया करने का प्रयास किया। उन्होंने नील देवी और भारत दुर्दशा में मिर्जापुर की कजरी, ख्याल और लावनी की तर्ज पर नए ढंग के गीत लिखे। आवहु सब मिल रोवहु भारत भाई, हा! हा!! भारत दुर्दशा देखि ना जाई...। भारत दुर्दशा के जरिए उन्होंने भारत की जनता के भीतर एक चेतना जगाई और एक नवीन काव्य सृष्टि हुई। इसके अलावा भारतेंदु ने हास्य व्यंग्य के अतिरिक्त पत्रिका सुकविवचन सुधा के माध्यम से उन्होंने तमाम नए-नए साहित्यकारों को पैदा किया। जिसे भारतेंदु मंडल के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार महावीर प्रसाद द्विवेदी केपहले भारतेंदु ने हिंदी के स्वरूप की नींव डाली थी।
सपना रह गया अधूरा
भारतेंदु ने साहित्य के प्रकाशन और उसके प्रचार-प्रसार में अपना काफी धन खर्च किया था। उनका एक सपना था देश में हिंदी के एक बड़े विश्वविद्यालय की स्थापना करना। लेकिन धन की कमी के कारण उनका यह सपना पूरा नहीं हो पाया। इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि उनके जन्म के डेढ़ सौ साल से भी ज्यादा बीत जाने के बावजूद हिंदीभाषी समाज उनके सपने को पूरा कर पाने में समर्थ नहीं हो सका है। भारतेंदु ने स्वयं कई प्रहसन लिखे जिसमें अंधेरनगरी आज भी प्रासंगिक है।
आज भी जारी है किसानों का शोषण
साहित्यकार व गीतकार सुरेंद्र वाजपेयी का कहना है कि भारतेंदु के संपूर्ण लेखन का मूल स्वर साम्राज्यवाद-सामंतवाद विरोधी है। जिन सवालों से भारतेंदु दो-चार होते हैं, जिन मुद्दों को उठाते हैं, वे आज भी बने हुए हैं। भारत की दुर्दशा कम नहीं हुई है, बल्कि बढ़ती ही जा रही है। देश राजनीतिक तौर पर भले ही आजाद है, पर पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शोषण के मकड़जाल से मुक्ति नहीं मिली है। किसानों का शोषण अंग्रेजी राज में जितना होता था, उससे कम आजाद भारत में नहीं हो रहा है। सांप्रदायिकता के जिस खतरे के प्रति भारतेंदु ने आगाह किया था, वह आज और भी उग्र रूप में सामने है। ऐसे में, भारतेंदु का लेखन आज और भी प्रासंगिक हो गया है।
15 साल की आयु में शुरू किया लेखन
15 वर्ष की उम्र से ही भारतेंदु ने लेखन शुरू कर दिया था। उसी समय उन्होंने जनता की चेतना के विकास में पत्रकारिता के महत्व को समझ लिया था। महज 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने कविवचनसुधा नामक पत्रिका निकाली। जिसमें उस समय के बड़े-बड़े विद्वानों की रचनाएं छपती थीं। उनकी प्रतिभा को नजरअंदाज करना अंग्रेज शासकों के लिए संभव नहीं था। 20 वर्ष की उम्र में वे ऑनरेरी मैजिस्ट्रेट बनाए गए। लेकिन राष्ट्रवादी विचारों के कारण उन्होंने यह पद जल्दी ही छोड़ दिया और साहित्य रचना में लग गए। 1873 में उन्होंने हरिश्चंद्र मैगजीन का प्रकाशन किया। उस जमाने में जब स्त्रियों की शिक्षा और उनके उत्थान के प्रति किसी का ध्यान नहीं था भारतेंदु ने 1874 में स्त्री शिक्षा के लिए बाला बोधिनी नामक पत्रिका निकाली। साथ ही, उन्होंने कई साहित्यिक संस्थाओं का भी गठन किया।