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साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र की पुण्यतिथि आज, 'रह जाएगी प्यारे हरीचंद की कहानी'

Wed, 06 Jan 2021 12:09 PM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
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भारतेंदु हरिश्चंद्र। - फोटो : अमर उजाला
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हिंदी की विपुल मात्रा और अनेक विधाओं में सृजन करने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र की मृत्यु महज 35 वर्ष की उम्र में छह जनवरी 1885 को हुई थी। उनके निधन पर कहा गया था कि प्यारे हरीचंद की कहानी रह जाएगी...। वर्तमान में यह बात एकदम सत्य साबित हुई। भारतेंदु जी नहीं रहे, लेकिन उनकी कहानी आज भी हर किसी की जुबान पर है।

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साहित्यकार डॉ. इंदीवर पांडेय का कहना है कि भारतेंदु जी अपने समय से बहुत ही आगे थे। साहित्य में भी और राजनीतिक विचार में भी। भारतेंदु ने बहुत पहले ही ब्रिटिश साम्राज्यवादी शोषण का हर स्तर पर प्रतिरोध किया था। भारतेंदु की लोकप्रियता लगातार बढ़ती जा रही थी। देश भर के विद्वानों और लेखकों से उनका संपर्क स्थापित हो चुका था। उनकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर काशी के विद्वानों ने 1880 में उन्हें भारतेंदु की उपाधि प्रदान की।

डॉ. पांडेय ने बताया कि भारतेंदु काशी के ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए हिंदी जगत के गौरव हैं। पहली बार इस देश में भारतेंदु ने साहित्य की प्राय: सभी विधाओं को समृद्ध किया है। उसमें एक नवीनता लाने की कोशिश की। भारतेंदु के पहले हिंदी या तो रीतिकालीन भाषा में आबद्ध थी या राजा शिवप्रसाद सितारेंहिंद के गद्य में आबद्ध थी। भारतेंदु ने उसे हिंदी का एक रूप दिया। भारतेंदु ने नाटकों का आविर्भाव किया। उनके नाटक पर्सियन थिएटर और बंगला के नाटकों से प्रभावित थे। इन नाटकों के माध्यम से उन्होंने भारत में ब्रिटिश राज के कारण जो दुर्दशा थी, शोषण और जहालत थी उसको प्रस्तुत किया। इन नाटकों के माध्यम से उन्होंने भारतीय मानस में स्वतंत्रता की चेतना जगाई।

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लोकचेतना के जरिए कविता को किया नया
कविता के क्षेत्र में भारतेंदु वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने लोक चेतना के माध्यम से कविता को नया करने का प्रयास किया। उन्होंने नील देवी और भारत दुर्दशा में मिर्जापुर की कजरी, ख्याल और लावनी की तर्ज पर नए ढंग के गीत लिखे। आवहु सब मिल रोवहु भारत भाई, हा! हा!! भारत दुर्दशा देखि ना जाई...। भारत दुर्दशा के जरिए उन्होंने भारत की जनता के भीतर एक चेतना जगाई और एक नवीन काव्य सृष्टि हुई। इसके अलावा भारतेंदु ने हास्य व्यंग्य के अतिरिक्त पत्रिका सुकविवचन सुधा के माध्यम से उन्होंने तमाम नए-नए साहित्यकारों को पैदा किया। जिसे भारतेंदु मंडल के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार महावीर प्रसाद द्विवेदी केपहले भारतेंदु ने हिंदी के स्वरूप की नींव डाली थी।

सपना रह गया अधूरा
भारतेंदु ने साहित्य के प्रकाशन और उसके प्रचार-प्रसार में अपना काफी धन खर्च किया था। उनका एक सपना था देश में हिंदी के एक बड़े विश्वविद्यालय की स्थापना करना। लेकिन धन की कमी के कारण उनका यह सपना पूरा नहीं हो पाया। इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि उनके जन्म के डेढ़ सौ साल से भी ज्यादा बीत जाने के बावजूद हिंदीभाषी समाज उनके सपने को पूरा कर पाने में समर्थ नहीं हो सका है। भारतेंदु ने स्वयं कई प्रहसन लिखे जिसमें अंधेरनगरी आज भी प्रासंगिक है।
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आज भी जारी है किसानों का शोषण
साहित्यकार व गीतकार सुरेंद्र वाजपेयी का कहना है कि भारतेंदु के संपूर्ण लेखन का मूल स्वर साम्राज्यवाद-सामंतवाद विरोधी है। जिन सवालों से भारतेंदु दो-चार होते हैं, जिन मुद्दों को उठाते हैं, वे आज भी बने हुए हैं। भारत की दुर्दशा कम नहीं हुई है, बल्कि बढ़ती ही जा रही है। देश राजनीतिक तौर पर भले ही आजाद है, पर पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शोषण के मकड़जाल से मुक्ति नहीं मिली है। किसानों का शोषण अंग्रेजी राज में जितना होता था, उससे कम आजाद भारत में नहीं हो रहा है। सांप्रदायिकता के जिस खतरे के प्रति भारतेंदु ने आगाह किया था, वह आज और भी उग्र रूप में सामने है। ऐसे में, भारतेंदु का लेखन आज और भी प्रासंगिक हो गया है।

15 साल की आयु में शुरू किया लेखन
15 वर्ष की उम्र से ही भारतेंदु ने लेखन शुरू कर दिया था। उसी समय उन्होंने जनता की चेतना के विकास में पत्रकारिता के महत्व को समझ लिया था। महज 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने कविवचनसुधा नामक पत्रिका निकाली। जिसमें उस समय के बड़े-बड़े विद्वानों की रचनाएं छपती थीं। उनकी प्रतिभा को नजरअंदाज करना अंग्रेज शासकों के लिए संभव नहीं था। 20 वर्ष की उम्र में वे ऑनरेरी मैजिस्ट्रेट बनाए गए। लेकिन राष्ट्रवादी विचारों के कारण उन्होंने यह पद जल्दी ही छोड़ दिया और साहित्य रचना में लग गए। 1873 में उन्होंने हरिश्चंद्र मैगजीन का प्रकाशन किया। उस जमाने में जब स्त्रियों की शिक्षा और उनके उत्थान के प्रति किसी का ध्यान नहीं था भारतेंदु ने 1874 में स्त्री शिक्षा के लिए बाला बोधिनी नामक पत्रिका निकाली। साथ ही, उन्होंने कई साहित्यिक संस्थाओं का भी गठन किया।
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