नौ दिवसीय चंडी महायज्ञ का बृहस्पतिवार को दुर्गाकुंड स्थित दुर्गा मंदिर प्रांगण में पूर्णाहुति के साथ समापन हुआ। साधु-संतों और भक्तों ने हवन, पूजन और यज्ञ की परिक्रमा की। 51 कन्याओं का पूजन कर उनकी आरती उतारी गई। सुख, शांति, समृद्धि और नकारात्मकता के नाश की कामना की गई। भंडारे में साधु-संतों और भक्तों ने प्रसाद ग्रहण किया।
संकल्पकर्ता एवं दुर्गा मंदिर के महंत पं. रमेश दुबे महाराज ने कहा कि मां चंडी बुराई के विनाश, शत्रुओं पर विजय और परम सुरक्षा प्रदान करने वाली सर्वोच्च शक्ति हैं। वे दुर्गा सप्तशती के रूप में विख्यात हैं। महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की संयुक्त ऊर्जा से नकारात्मकता का नाश, सुख-समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
उन्होंने कहा कि चंडी देवी ब्रह्म की अग्नि शक्ति और प्रचंड क्रोध का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो अन्याय का नाश करती हैं। वे आठ भुजाओं वाली और सिंह पर सवार होकर महिषासुर जैसे राक्षसों का वध करने वाली सर्वोच्च शक्ति हैं। इस दौरान विशिष्टजनों का सम्मान भी किया गया। इस मौके पर शिवम दुबे, नीरज उपाध्याय, निशांत कुमार, गायत्री वैजाक, संजय अग्रहरि, रंजना दुबे, रिशु गिरि आदि उपस्थित रहे।