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विश्व मातृ दिवस: जो भी मैं हूं उसके लिए अपनी प्यारी मां का कर्जदार हूं

Sat, 08 May 2021 07:34 PM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
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demo pic - फोटो : अमर उजाला
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पूछा जब मैंने भगवान से जन्नत का पता, तो उसने अपनी गोद से उतारकर मां की बांहों में झुला दिया। मां शब्द इतना विराट और ममता से परिपूर्ण है जिसकी व्याख्या आसान नहीं है। अब्राहम लिंकन ने कहा था कि जो भी मैं हूं या होने की उम्मीद है, मैं उसके लिए अपनी प्यारी मां का कर्जदार हूं। विश्व मातृ दिवस पर हम भी आपको कुछ ऐसी ही मांओं से मिलवाएंगे, जिन्होंने अपने मजबूत इरादों से अपने बच्चों की जिंदगी में सफलता के प्रतिमान गढ़े हैं।

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मुसीबतों से लड़कर बेटियों और बेटों के सपनों में भरे रंग
महमूरगंज के निराला नगर की नंदिनी देवी का सपना है कि उनकी बेटियां खेल में देश और बनारस का नाम रोशन करें। नंदिनी के पति रतनलाल मौर्या पानी की सप्लाई का काम करते हैं। दो बेटे और पांच बेटियों वाले परिवार का इससे गुजारा नहीं हो पा रहा था उस पर बड़े बेटे की आंख के इलाज में काफी रुपये खर्च हो गए। गृहस्थी की गाड़ी बेपटरी हो गई तब नंदिनी ने काम करने की ठानी। करीब 16 साल पहले किराए के एक कमरे के बाहर ठेले पर डोसा बनाकर बेचना शुरू किया। मुश्किलों के बावजूद नंदिनी ने पांच बच्चों को पढ़ाया।

एक बेटी ने टेबल टेनिस से नेशनल खेला तो दूसरी बेटी का चयन स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया साई में हो गया है। तीन बड़ी बेटियों को पढ़ा कर उनकी शादी करा दी है। नंदिनी ने बेटियों के सपनों की खातिर संघर्ष किया। दिन में घर के काम निपटाकर शाम होते ही ठेला लगाती। ठेले से होने वाली आमदनी को बेटियों की खेल की सुविधाओं में खर्च कर देती। विरांद्री अब एक कान्वेंट स्कूल में स्पोर्ट्स टीचर हैं उसे बीपीएड करना है, लेकिन दिक्कत पैसों की है प्रैक्टिस के साथ उसने नौकरी शुरू कर दी है। विरांद्री का कहना है कि मां ने कड़ी मेहनत कर उन्हें यहां तक पहुंचाया है। नंदनी कहती हैं कि गरीबी एक परीक्षा है इस से भागा नहीं सीखा जाता है। मेरी पूरी कोशिश होती है कि भले ही घर में दाल रोटी ही बने लेकिन बेटियों की प्रैक्टिस न रुके।

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दीपक जायसवाल: जिन बच्चों की माँएँ नहीं होतीं - फोटो : social media
बच्चों के साथ-साथ मां ने मानसिक अस्थिर पिता को भी संभाला
शिवपुर इलाके के कादीपुर क्षेत्र की रहने वाली श्रुति दुबे बताती हैं कि बचपन से ही मां आभा दुबे ने मेरी और मेरे भाई की परवरिश की। पिता बचपन से ही मानसिक अस्थिरता से जूझते रहे हैं। जिस वजह से मां ने पिता की भी भूमिका निभाई। मेरे भाई और मुझमें उन्होंने कभी भी कोई फर्क नहीं किया। साथ ही पिता जी को भी संभाला। आज मैं उन्हीं के आदर्शों पर चलकर समाज में परिवार का नाम रौशन करना चाहती हूं। माता और पिता दोनों की सशक्त भूमिका निभाते हुए मेरी मां ने मुझे सहयोग, स्वतंत्रता और हिम्मत दी। जब भी कभी मुझपर कोई उंगली उठाता तो दर्द उन्हें सबसे पहले होता, उनकी प्रार्थना और आशीर्वाद में गजब की ताकत है जो सदैव मेरे अंदर हिम्मत भरती है। वे लोग जो हमें कुछ नहीं समझते थे आज वही लोग मेरी मां की परवरिश को सराहते हैं।

मां ने बेटी को बनाया काबिल, अब फहरा रही परचम
पति मोतीलाल का कैंसर की बीमारी से साथ छूटा तो काशी विद्यापीठ के पहाड़ी गांव की रहने वाली मीना देवी ने एक साहसी मां की भूमिका निभाते हुए तीन बेटी और दो बेटों की जिम्मेदारी संभाली। जिन्होंने मंगलसूत्र बनाने का काम करके सिर्फ  पति के इलाज की ही जिम्मेदारी नहीं उठाई बल्कि दो बेटियों की शादी की और सबसे छोटी बेटी पूजा को नेशनल फुटबालर बनाया जो चार बार सीनियर, चार बार जूनियर, एक बार स्कूल नेशनल, इंडिया कैंप सहित यूपी टीम का कप्तान भी रहीं। पूजा अब पंजाब की लवली यूनिवर्सिटी से स्कॉलरशिप प्राप्त कर उसकी टीम से खेलती हैं। जबकि दो भाई पढ़ाई और मां के काम में सहयोग करते हैं।

खेती किसानी के सहारे मां बेटियों को मुकाम तक पहुंचाया
2007 में पति सहदेव दीक्षित के निधन के बाद सुसुवाही की रहने वाली जान्हवी दीक्षित ने न सिर्फ  खुद को संभाला। साथ में पांच बेटियों और दो बेटों की भी जिम्मेदारी उठाई। दो बेटियों को पढ़ा लिखाकर ब्याह दिया तो तीसरी बेटी सरिता को समाज तमाम तानों के बाद भी फुटबालर बनाया। जिसने मां के सहयोग से बतौर फुटबालर खुद को स्थापित किया। सरिता ने नौ बार नेशनल प्रतियोगिताओं में यूपी टीम का प्रतिनिधित्व किया। सरिता अब बीपीएड की पढ़ाई करके रामनगर स्थित एक निजी स्कूल में खेल प्रशिक्षक हैं। वह अपने दो भाई और मां की जिम्मेदारी संभाल रही हैं।
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Mothers Day 2021 in India - फोटो : Amar ujala
घर पर रहते हैं बच्चे, अमिता कर रही मरीजों की सेवा
कोरोना काल में इन दिनों सेवा देने वाले स्वास्थ्यकर्मियों की जितनी सराहना की जाय वो कम है। घर पर बच्चों को छोड़ चिकित्सक, पैरामेडिकल स्टाफ सेवा दे रहे हैं। उन्हें बच्चों की चिंता तो रहती है, लेकिन कोरोना काल में मरीजो की सेवा बेहद जरूरी है। सीएचसी चोलापुर पर तैनात स्टाफ नर्स अमिता राय जीजान से मरीजों की सेवा में लगी हैं। लालपुर निवासी अमिता के पति हितेश शर्मा भी स्वास्थ्य विभाग में ही तैनात हैं और इस समय कोरोना जांच से जुड़े कार्य में अहम भूमिका निभा रहे हैं। अमिता ने बताया घर में बच्चों सूर्यांश-सिद्धांत के सुरक्षित रहने की चिंता तो रहती है लेकिन मरीजों की सेवा से उन्हें बहुत खुशी हुई मिलती। पति के साथ-साथ बच्चों का भी पूरा सहयोग मिलता है।

कोविड ड्यूटी करना चुनौती, मिलता है सुकून
बीएचयू अस्पताल में नर्सिंग ऑफिसर सरोज शर्मा भी कोरोना संक्रमण का डर भूल इन दिनों कोविड मरीजो की सेवा में लगी हैं। उनका कहना है कि यह सौभाग्य की बात है कि कोरोना संक्रमण के नियंत्रण के प्रयास में अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं। ऐसे समय में जब लोग अस्पताल नाम से ही भय में आ जा रहे हैं, उस समय कोविड अस्पताल, सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक में संक्रमित मरीजों के इलाज में लगी सरोज का कहना है कि घर से निकल कर अस्पताल आने के बाद बच्चे की चिंता तो रहती है लेकिन मरीजों के सेवा में जो सुकून मिलता है वह कहीं नहीं मिलता है। अगर ड्यूटी के दौरान समय मिलता है तो फोन से ही बात कर बच्चों का हाल चाल पूछ लेते हैं।
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