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तुम जो छू लो शिवाला बनूं प्रेम का, इक मीरा दीवानी तो मुझमें भी है...

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इक अधूरी कहानी तो मुझमें भी है, धड़के दिल वो जवानी तो मुझमें भी है। तुम जो छू लो शिवाला बनूं प्रेम का, इक मीरा दीवानी तो मुझमें भी है... इंदौर से पधारी कवयित्री डॉ. भुवन मोहिनी ने जब यह लाइनेें पढ़ी तो हर कोई प्रेम रस से सराबोर हो उठा। रविवार की देर शाम को विश्व पर्यावरण दिवस पर अस्सी घाट के मुक्ताकाशीय मंच पर हरिअर हास्य महोत्सव में देर रात तक हास्य-व्यंग्य और प्रेम रस की धार बहती रही।
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रविवार को कार्यक्रम की शुरुआत जगदंबा तुलस्यान ने दीप जलाकर की। इसके बाद डॉ. अनिल चौबे ने पर्यावरण व हास्य का समावेश करते हुए सुनाया जलवायु और वृक्ष से अधराें की मुस्कान, पर्यावरण संवारिए तभी बचेगी जान। पं. दीनानाथ हो चाहे चच्चा करीम, हर उत्सव में रोपिए पीपल, बरगद, नीम...। कानपुर से आए हेमंत पांडेय ने सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करते हुए सुनाया सड़कों पर चल रहे हो तुमको टोल की पड़ी है, सिलेंडर घर आ रहा तुमको मोल की पड़ी है। शायद देश से तुमको मोहब्बत ही नहीं, यहां हिंदुत्व खतरे में है तुमको पेट्रोल की पड़ी है..., इसके बाद हास्य कवि अरुण जैमिनी ने मंच संभाला तो पूरा घाट का इलाका तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। अरुण ने हास्य व्यंग्य की एक से बढ़कर प्रस्तुतियां दीं। उन्होंने सुनाया इक्कीसवी सदी में ढूंढते रहे जाओगे आंखों में पानी, दादी की कहानी, संतों की बानी, कर्ण जैसा दानी, परोपकारी बंदे और अर्थी को कंधे...। इसके अलावा गजेंद्र प्रियांशु ने भी काव्य पाठ किया। संयोजन अनुराग मौर्य ने किया।
भीड़ से परेशान हुए पर्यटक
घाट पर हास्य महोत्सव के दौरान भीड़ अधिक होने के कारण पर्यटकों को परेशानी झेलनी पड़ी। नए अस्सी घाट पर रविवार होने के कारण भीड़-भाड़ आम दिनों से ज्यादा थी।
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