स्वर्वेद महामंदिर पर हुआ 5101 विश्वशांति वैदिक महायज्ञ
- फोटो : अमर उजाला
संत प्रवर विज्ञानदेव ने कहा कि यज्ञ त्याग का भाव है। अग्नि की ज्वाला सदैव ऊपर की ओर उठती है। अग्नि को बुझा सकते हैं, नीचे झुका नहीं सकते। वैसे ही हमारा जीवन भी ऊर्ध्वगामी हो, श्रेष्ठ और पवित्र पथ पर, कल्याणकारी पथ पर निरंतर गतिशील रहे। हमारे अंत:करण में ज्ञान की अग्नि जलती रहे, अंधेरा न हो हमारे अंत:करण में। शरीर में कर्म की अग्नि जलती रहे। इन्द्रियों में तप की अग्नि जलती रहे। श्रेष्ठ विचारों की, सद्विचारों की अग्नि प्रज्वलित रहे। अशुभ नष्ट होता रहे। यज्ञ की अग्नि यही संदेश देती है।
संत प्रवर ने कहा कि यज्ञ श्रेष्ठ मनोकामनाओं की पूर्ति और पर्यावरण शुद्धि का भी साधन है। यज्ञ यहीं तक सीमित नहीं है। वैदिक यज्ञ हमारे भीतर त्याग की भावना का विकास करता है। मैं और मेरा से ऊपर उठकर विश्व शांति का मार्ग प्रशस्त करता है। आज की ग्लोबल वॉर्मिंग को रोकने का यह एक सशक्त माध्यम है।
इस पर सभी पर्यावरण चिंतकों का ध्यान अवश्य होना चाहिए। यज्ञ एवं योग के सामंजस्य से ही विश्व में शांति स्थापित की जा सकती है। यज्ञ का धुआं कोई डीजल या पेट्रोल का धुआं नहीं है। यह आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का लाभकारी धूम्र है जिससे स्वास्थ्य लाभ एवं पर्यावरण शुद्धि दोनों का लाभ होता है।
विहंगम योग संत समागम के 98वें वार्षिकोत्सव में योग, आयुर्वेद, पंचगव्य, होम्योपैथ आदि चिकित्सा पद्धतियों के चिकित्सकों के निर्देशन में रोगियों को चिकित्सा परामर्श दिया जा रहा है। भक्तों के लिए अनवरत भंडारा चल रहा है।
चार बड़े भोजनालयों में 60 काउंटर बनाए गए हैं ताकि सहजता से सभी को भोजन प्रसाद प्राप्त हो सके। यहां आश्रम द्वारा प्रकाशित सैकड़ों साहित्य, आध्यात्मिक मासिक पत्रिका, विशुद्ध जड़ी बूटियों से निर्मित आयुर्वेदिक औषधियां, गो आधारित पंचगव्य औषधियां भी सुलभ हैं।
स्वर्वेद महामंदिर पर हुआ 5101 विश्वशांति वैदिक महायज्ञ
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संध्याकालीन सत्र में संत प्रवर विज्ञानदेव महाराज ने अपने सत्संग में स्वर्वेद महाग्रंथ की महिमा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि स्वर्वेद ईश्वरीय ज्ञान का सदग्रंथ है, कोई बुद्धि के आधार पर लिखा गया ग्रंथ नहीं है। यह योगी सद्गुरु सदाफलदेव के योग समाधि में अनुभवों की अभिव्यक्ति है।
आचार्य स्वतंत्रदेव ने बताया कि हमें सांसारिक मनोकामनाओं के बजाय सदगुरु से भक्ति की ही मांग करनी चाहिए। एक भक्त की हर आवश्यकता समय से पूर्ण हो जाती है। प्रेम की पराकाष्ठा ही भक्ति है। अनन्य प्रेम एवं समर्पण भाव जीवन को बहुत आगे ले जाता है।