संकट मोचन संगीत समारोह में पं. हरिप्रसाद चौरसिसा
- फोटो : अमर उजाला
पांच दशकों से दर्शकों के सिर चढ़कर बोल रहा पं. हरिप्रसाद की बांसुरी का जादू फिर से जवां हो उठा। उनके शिष्य विवेक सोनार और शिष्या वैष्णवी ने बीच-बीच में हो रही रिक्तता को महसूस नहीं होने दिया। बांसुरी के उस्ताद की बांसुरी जब बजनी शुरू हुई तो मंदिर प्रांगण के कोने-कोने में रस माधुरी घुलने लगी। पं. हरिप्रसाद ने राग मारुविहाग को मुरली की तान पर सजाया। झप ताल और तीन ताल में गत वादन के साथ ही लयकारियों की मधुर बंदिशों ने श्रोताओं को भी मंत्रमुग्ध कर दिया। डेढ़ घंटे की अनवरत प्रस्तुति में पं. हरिप्रसाद के सुरों को देखकर किसी को भी यह अहसास हुआ कि हौसलों के आगे हर मुश्किल बस शब्द बनकर रह जाती हैं। विराम प्रस्तुति में पं. हरिप्रसाद ने जब बांसुरी पर ओम जय जगदीश हरे...की धुन बजाई तो पूरा प्रांगण भगवान विष्णु के रंग में रंग गया। श्रोता भी जय जगदीश हरे के गायन के साथ तालियां भी संगत कर रही थीं।
संकटमोचन संगीत समारोह में बांसुरी बजाते पं. हरि प्रसाद चौरसिया।
दूसरी प्रस्तुति में मंच पर विराजमान हुए धारवाड़ से आए पं. वेंकटेश कुमार। उनके साथ तबले पर केशव जोशी और संवादिनी पर मोहित साहनी ने संगत की। तीसरी प्रस्तुति में दिल्ली से आए राजेंद्र गंगानी ने कथक की प्रस्तुति दी। गंगा तरंग रमणीय जटाकलापं... से उन्होंने नृत्य का आरंभ किया और अपनी भाव भंगिमाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। रामधुन पर आधारित नृत्य नाटिका भी दर्शकों के लिए यादगार बन गई। इसके बाद उन्होंने हनुमान लला, मेरे प्यारे लला...पर बजरंगबली की आराधना को जीवंत किया। तबले पर संजू सहाय, पखावज पर पं. फतेह सिंह गंगानी, गायन पर शमी उल्लाह खान, सितार पर ध्रुव नाथ मिश्र, बांसुरी पर अतुल शंकर ने संगत की। विराम प्रस्तुति के रूप में तबले की थाप पर ना धिन धिन धिन्ना...की प्रस्तुति से श्रोताओं को रोमांचित किया।
मूर्तिकला और बांसुरी की भी हुई संगत
वाराणसी। एक तरफ जहां संगीत की सुर साधना हो रही थी वहीं दूसरी तरफ मंच के सामने सधे हुए हाथ गढ़ रहे थे। मूर्तिकार राजेश कुमार ने बांसुरी के उस्ताद पं. हरिप्रसाद चौरसिया का सजीव शिल्प मिट्टी पर जीवंत किया। पहली प्रस्तुति के समापन पर उन्होंने उनकी मूर्ति पं. हरिप्रसाद चौरसिया को भेंट की।