इसके बाद तो फिर इमामबाड़ा सिसकियों और ‘हाय हुसैन’ की दर्द भरी सदाओं से गूंजने लगता है। वहीं दूसरी तरफ बिलखते हुए अजादार नौहा और मातम से गमे हुसैन को और ऊंचाइयां देने लगते हैं। हालांकि ताबूत तो अलग-अलग कई स्थानों पर उठाए जाते हैं। लेकिन एक ही स्थान पर इतने ताबूत की जियारत नहीं कराई जाती।
अंजुमन आबीदिया के साहबे बयाज (नौहा पढ़ने की शुरुआत करने वाला) शामिल रिजवी बताते हैं कि वाराणसी की कई अंजुमनें भी इसमें सहयोग करती हैं। वाराणसी में यह कार्यक्रम 10वीं मुहर्रम के बाद पड़ने वाले रविवार को किया जाता है। जबकि पूर्वांचल में जौनपुर में यह सफर माह की 17 तारीख को और गाजीपुर में सफर माह का चांद दिखने के बाद पहले रविवार को आयोजित होता है।
इजाजत मिली तो सांकेतिक होगा कार्यक्रम
शामिल रिजवी बताते हैं कि कोरोना के चलते कार्यक्रम इस बार नहीं होने के पूरे आसार हैं। अगर शासन प्रशासन की गाइड लाइन में इजाजत मिलती है तो कार्यक्रम सदर इमामबाड़ा सरैया में सांकेतिक रूप में कराया जाएगा। सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा पालन होगा और सैनिटाइजेशन किया जाएगा। संस्था से जुड़े लोग और मोमेनीन व्यवस्था संभालेंगे।