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कोरोना इफेक्ट : बदहाल हैं रेफरी अंपायर और स्कोरर

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वाराणसी। कोरोना वायरस के कारण खेलकूद और प्रतियोगिताएं स्थगित हैं। ऐसे में तमाम खेलों से जुड़े खेल प्रशिक्षक, रेफरी, अंपायर और स्कोरर की स्थिति बेहाल है। कोई चाय की दुकान से घर का खर्च चला रहा है तो कोई घर परिवार के सहयोग से अपनी जरूरतें पूरी कर पा रहा है। खेल से जुड़े उक्त तमाम वर्गों को खेल संघों की ओर से भी कोई मदद नहीं मिल रही। जिले में गिने चुने अंपायर, रेफरी और स्कोरर हैं। जिनमें कुछ क्वालीफाई है तो कुछ क्वालीफाई होने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जो सामान्य दिनों के खेल आयोजनों से होने वाली आमदनी से घर चला लेते थे। मगर कोरोना काल में जनपद के कई सक्रिय अंपायर, रेफरी और स्कोरर बदहाली की जिंदगी जी रहे हैं।
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40 वर्षीय राजेश पटेल पिछले 12 साल से अंपायर की भूमिका में जिले के कई क्रिकेट टूर्नामेंट में अंपायरिंग करते रहे हैं। जो सामान्य दिनों में यूपीसीए द्वारा आयोजित क्रिकेट प्रतियोगिताओं में 30 से 40 ओवर के मैच में 500 रुपये और मेमोरियल टूर्नामेंट में अंपायरिंग करके 700 से एक हजार रुपये की आमदनी प्रतिदिन कर लेते थे। पूरे वर्ष में तीन महीने जुलाई, अगस्त और सितंबर को छोड़ दिया जाए 70 से 80 हजार रुपये प्रतिवर्ष की आमदनी कर लेते थे। जिससे घर का खर्च चल जाता था। मगर इस वर्ष जब से कोरोना का ग्रहण लगा है खेलकूद स्थगित हैं। आमदनी का कोई जरिया नहीं है।
24 वर्षीय ऑनलाइन स्कोरर विपिन कुमार ने बताया वह पिछले पांच वर्षों से स्कोरिंग का काम कर रहे हैं। हालांकि उन्होंने पूर्वांचल की अंडर 16 और 19 टीम में बैट्समैन के रूप में क्रिकेट भी खेला है। लेकिन उनकी रुचि स्कोरिंग में रही है। जिससे वह लोकल टूर्नामेंट में 500 और यूपीसीए द्वारा आयोजित नेशनल टूर्नामेंटों में 1500 रुपये तक आमदनी कर लेते थे। मगर अब क्रिकेट की सभी गतिविधियां बंद हैं तो आमदनी का कोई जरिया भी नहीं। अब हालात ऐसे हो गए है कि अपने बड़े भाई से मदद लेनी पड़ती है। जो केबल ऑपरेटर काम काम करते हैं। जनपद में गिने-चुने स्कोरर हैं मगर ऑनलाइन स्कोरिंग का काम करने वाले विपिन इकलौते हैं।
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31 वर्षीय हॉकी रेफरी सुनील कुमार ने बताया की हॉकी इंडिया के तहत आयोजित नेशनल प्रतियोगिताओं में हमें 1100 रुपये जबकि जिला स्तरीय और राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में 800 रुपये तक मिल जाते हैं। वहीं माध्यमिक विद्यालयों द्वारा आयोजित हॉकी प्रतियोगिता में 500 रुपये मिल जाते हैं। साल के छह माह में छह से सात टूर्नामेंट से 30 हजार तक आमदनी कर लेते थे। जिससे जरूरतें पूरी हो जाती थीं। मगर अब हालात कुछ ऐसे है कि चाय की दुकान से घर का खर्च चलाना पड़ रहा है।
क्रिकेट कोच अमल चतुर्वेदी ने बताया कि मैं पिछले कई वर्षों से सिगरा स्टेडियम में क्रिकेट खिलाडि़यों को प्रशिक्षण देता रहा हूं। इस वर्ष कोरोना की वजह से मानदेय प्रशिक्षकों की बहाली नहीं हो सकी है। जिससे मेरे परिवार का खर्च चलता था। अब वह भी बंद है तीन महीनों से। ऐसे में घर और परिवार का खर्च चला पाना हम जैसे प्रशिक्षकों के लिए बहुत मुश्किल हो रहा है। जनपद में 400 के करीब मानदेय प्रशिक्षक है। जो यूपी खेल निदेशालय द्वारा मानदेय पर आश्रित थे।
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