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वाराणसी: जिले का साइलेंस जोन सुरक्षित नहीं, ज्यादा शोर करौंदी में, नेवादा सबसे शांत; चौंका देंगे ये आंकड़े

Sat, 10 Oct 2026 10:54 AM IST
Aman Vishwakarma हिमांशु अस्थाना, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

वाराणसी में साइलेंस जोन भी ध्वनि प्रदूषण से सुरक्षित नहीं हैं। करौंदी में शाम को सबसे ज्यादा 105.6 डेसीबल शोर दर्ज किया गया। महमूरगंज में 105.3 और सुंदरपुर में 105 डेसीबल ध्वनि स्तर रहा। इसके विपरीत नेवादा सबसे शांत क्षेत्र रहा। निर्धारित मानकों से अधिक शोर लोगों की सेहत और सुकून के लिए चिंता का विषय है।
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काशी का साइलेंस जोन भी अब शोरगुल की चपेट में है। - फोटो : अमर उजाला डिजिटल
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विस्तार
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काशी का साइलेंस जोन भी अब शोरगुल की चपेट में है। यानी घाट, अस्पताल और बीएचयू के आसपास के इलाकों में ध्वनि प्रदूषण बढ़ा है। काशी का सबसे शोरगुल इलाका कैंट, गोदौलिया, मैदागिन या लंका नहीं बल्कि बीएचयू के पास करौंदी इलाका है। यहां कान की सुनने की क्षमता से दो गुना ज्यादा शोरगुल है। बीएचयू सहित दो संस्थानों की ओर से काशी के 27 ट्रैफिक चौराहों पर सुबह, दोपहर और शाम को होने वाले शोर के स्तर को मापा गया तो इसका डेटा चौंकाने वाला आया। 

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बीएचयू-हैदराबाद गेट के पास करौंदी में शाम के समय 105.6 डेसिबल शोर दर्ज किया गया। यह पूरे शहर में दिन के तीनों पहर में सबसे ज्यादा शोर थी। इसके बाद महमूरगंज में सुबह के वक्त 105.3 डेसिबल और सुंदरपुर चौराहे पर 105 डेसिबल ध्वनि निकली। दोपहर में सबसे ज्यादा 104.6 डेसिबल ध्वनि अस्सी इलाके में दर्ज की गई। 

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सबसे कम शोर बीएचयू के विश्वनाथ मंदिर चौराहे पर 73.2 डेसिबल दर्ज किया गया। पूरे शहर का सबसे कम शोर वाला स्थान नेवादा चौराहा रहा। यहां पर 55.3 डेसीबल ध्वनि रिकॉर्ड की गई। सबसे ज्यादा औसत शोर दोपहर में पांडेयपुर चौराहे पर 94.5 डेसीबल रहा। यह शोध बीएचयू के महिला महाविद्यालय की डॉ. रूही रावत, भूगोल विभाग से सौम्या और दून विश्वविद्यालय से डॉ. अजीत सहाय ने किया है।  

एक महीने में दिन में तीन बार जुटाए आंकड़े : काशी में ध्वनि प्रदूषण से संबंधित आंकड़े मार्च-अप्रैल 2026 में एक महीने तक दिन में तीन बार जुटाए गए। सुबह 7 से 10 बजे, दोपहर 12 से 3 बजे और शाम 5 से 8 बजे का समय तय किया गया था। 

आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला कि सुबह 7 से 10 बजे के बीच स्कूल और कार्यालय जाने वाले लोगों के चलते ट्रैफिक रहता है। दोपहर 12 से 3 बजे के बीच कई जगहों पर शोर कम होता है लेकिन शाम पांच से आठ बजे के बीच लोगों और पर्यटकों की आवाजाही बढ़ जाती है। इससे ध्वनि स्तर फिर से बढ़ जाता है। 

तकनीक कान में शोर के प्रति संवेदनशीलता का करती है जांच : ध्वनि मापने के लिए क्लास-1 साउंड लेवल मीटर का इस्तेमाल किया गया। माप की सटीकता के लिए हर एक पहर से पहले और बाद में उपकरण को ढंग से संचालित किया गया। सभी मापन ए-वेटेड फ्रीक्वेंसी रिस्पॉन्स के आधार पर किए गए। उपकरणों को जमीन से डेढ़ मीटर की ऊंचाई पर रखा गया। 

सबसे कम शोर वाले 5 स्थान
  • नेवादा चौराहा - 55.3 डेसिबल सुबह
  • वीटी, बीएचयू - 59.6 
  • केवी चौराहा, बीएचयू - 60.2 
  • बजरडीहा चौराहा- 63.4 
  • सीर चौराहा - 67.1

बढ़ता है मानसिक तनाव : मानसिक चिकित्सालय के चिकित्सा अधिकारी डॉ. अजय सिंह ने बताया कि आज की ट्रैफिक, भागदौड़ भरी जिंदगी, काम के दबाव के चलते मानसिक तनाव काफी बढ़ जाता है। इसका इलाज संभव है। 

सबसे ज्यादा शोर वाले पांच स्पॉट

करौंदी, सुंदरपुर, महमूरगंज और अस्सी के अलावा
  • दुर्गाकुंड - 103.9 डेसिबल
  • रविदास गेट - 103.8 
  • लंका चौराहा - 103.5
  • भेलूपुर - 102.5 
  • सोनारपुरा - 102.3 

यह ब्रेन हेमरेज या कार्डियक अरेस्ट का भी कारण बनता है : प्रो ओमशंकर : कार्डियोलॉजिस्ट प्रो. ओमशंकर ने बताया कि 120 डेसीबल से ज्यादा शोर हुआ तो फिर कान का पर्दा फट जाता है। खून की नलियां सिकुड़ जाती हैं। लंबे समय तक ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। फोर्टिसॉल हार्मोन बढ़ जाता है। यह ब्रेन हेमरेज या कार्डियक अरेस्ट का भी कारण बनता है। 
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प्रो. विश्वंभर ने बताया- गुस्सा और चिड़चिड़ापन स्वाभाविक : ईएनटी विभागाध्यक्ष प्रो. विश्वंभर सिंह ने बताया कि कान की सुनने क्षमता 25 डेसीबल तक सबसे सही होती है। इससे ऊपर आवाज आए तो फिर गुस्सा और चिड़चिड़ापन आना स्वाभाविक है। शोरगुल से कम सुनाई देने लगता है। कान में दर्द भी हो सकता है।
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