गंगा आरती में शामिल सैकड़ों लोगों के साथ ही शाम को दशाश्वमेध घाट पर बड़े पैमाने पर लोगों की भीड़ थी। हालांकि दशाश्वमेध घाट और गोदौलिया पर रखे गए बम समय रहते पकड़े गए और उन्हें डिफ्यूज कर दिया गया। बनारस में सबसे पहले विस्फोट दशाश्वमेध के ब्रह्मेश्वर महादेव मंदिर में वर्ष 2005 में हुआ था।
मगर, उस समय प्रशासन ने इस घटना पर पर्दा डालते हुए इसे सिलिंडर विस्फोट साबित कर दिया था। उस घटना को नजरअंदाज किए जाने के कारण आतंकी संगठन बनारस में बेखौफ होकर एक साल बाद ही पूरे शहर को दहलाने की योजना बना दी।
विस्फोट की आतंकी घटना से बिलख रहे बनारस में उस दिन ज्यादातर जिम्मेदार अधिकारी शहर से नदारद थे। तत्कालीन डीआईजी आरएन यादव, एसएसपी नवनीत सिकेरा, एसपी सिटी दिनेश चंद दूबे और जिलाधिकारी इटावा में शादी समारोह में गए थे। उस समय आईजी केएल मीणा और चार्ज पर एसएसपी परेश पांडेय जब तक कुछ समझ पाते तब तक आतंकी घटना को अंजाम देकर निकल चुके थे।
फरार आतंकियों को लेकर पुलिस रही बेपरवाह
बनारस का दिल दहलाने वाली घटना में पुलिस ने कई आतंकियों की शिनाख्त की, मगर केवल वजीउल्लाह को ही पकड़ पाई। हूजी कमांडर मोहम्मद शमीम, मोहम्मद जकारिया, मुस्तफिज और बशीर तक बनारस पुलिस नहीं पहुंच पाई। हालांकि मोहम्मद जकारिया को मुठभेड़ में जम्मू बॉर्डर पर मार गिराया गया था। मगर, बाकी आतंकियों का कोई सुराग पुलिस के पास नहीं है।
संकटमोचन मंदिर में विस्फोट के दौरान रीठा के पेड़ ने भक्तों की जान बचा ली थी। महंत विश्वंभर नाथ मिश्र की माने तो बम का पहला झटका इस पेड़ की मोटी टहनियों ने झेला था और यही कारण है कि दर्जनों भक्त विस्फोट से बाल-बाल बच गए थे। पेड़ की टहनियों पर विस्फोटक के चलते ज्यादातर हिस्सा क्षतिग्रस्त हुआ था। उसके बाद से ही यह पेड़ भी आस्था का केंद्र है।
संकट मोचन मंदिर और कैंट स्टेशन पर सीरियल ब्लास्ट मामले में फांसी की सजा पाने वाले वलीउल्लाह पर तत्कालीन सपा सरकार ने मुकदमा वापसी की कोशिश की थी। बताया जा रहा है कि वर्ष 2006 में तत्कालीन विशेष सचिव राजेंद्र कुमार ने इस बारे में जिला प्रशासन को पत्र भी भेज दिया था। इधर, इसकी जानकारी मिलते ही लोगों ने विरोध शुरू कर दिया। जिसके बाद सरकार बैकफुट पर आ गई थी और पत्र भेजने के बाद आगे की कोई कार्रवाई नहीं हुई।