इस ऐतिहासिक रामलीला की तैयारी सावन महीने से ही शुरू हो जाती है। श्रीराम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और सीता के पात्र ब्राह्मण कुल के कलाकार ही निभाते हैं। उनकी उम्र भी 16 साल से अधिक नहीं होनी चाहिए। दो सदी की परंपरा जस की तस बरकरार है। सावन में ही पात्रों का चयन के लिए बाकायदा ऐसे पात्रों की खोज शुरू हो जाती है।
पात्रों का चयन होने के बाद उस पर मुहर काशी नरेश लगाते हैं। उनकी अनुमति मिलने के बाद पात्रों को दो महीने तक नए जीवन में ढलना होता है। पूरी रामलीला अवधी भाषा में होती है। पात्रों को अवधी भाषा का सटीक उच्चारण करना सिखाया जाता है।
परिवार से मिल नहीं सकते कलाकार
चारों भाइयों समेत सीता, हनुमान समेत अन्य पात्रों का चयन होने के बाद उनका जीवन रामलीला तक बदल जाता है। वह रामनगर में राज अतिथि की तरह रहते हैं। भोर से ही दिनचर्या शुरू हो जाती है। मन, कर्म और वचन से उनको आदर्श का पालन करना होता है। 31 दिनों तक चलने वाली लीला में पात्र लीला स्थल तक अपने पैरों पर चलकर नहीं जाते।
अयोध्या और जनकपुरी भी है रामनगर में
रामनगर की रामलीला की सबसे बड़ी खासियत है लीला का अलग-अलग स्थान। यहां अयोध्या, जनकपुरी, लंका, अशोक वाटिका, पंचवटी समेत रामायण के अनेक स्थल हैं। सालों की ये परंपरा आज भी कायम है। लीला का स्थल बदलना भक्तों के लिए खासा आकर्षक होता है।
काशी नरेश करते हैं रामलीला का शुभारंभ
रामनगर की रामलीला का आरंभ काशी नरेश करते हैं। पहली लीला के मंचन से आज तक यह परंपरा जारी है। लीला के पहले दिन हाथी पर सवार होकर काशी नरेश पहुंचते हैं और श्रीराम जानकी समेत चारों भाइयों की पूजा करते हैं। काशी नरेश परंपरा के मुताबिक रोजाना की लीला में शामिल होते हैं। वह लीला स्थल पर सबसे पीछे हाथी के हौदे पर सवार होते हैं। लीला का समापन भी रोजाना काशी नरेश की आज्ञा पर ही होता है।