15 दिन से एक साल तक होने वाले सांस्कृतिक व सामाजिक आयोजनों के लिए पांच हजार रुपये वार्षिक शुल्क देना होगा। प्रभारी अधिकारी राजस्व की ओर से जारी नोटिस के अनुसार, गजट के प्रकाशन तिथि 22 जुलाई से यह नई व्यवस्था लागू हो चुकी है। घाटों के रखरखाव और साफ-सफाई के लिए यह शुल्क लगाया जा रहा है।
पक्ष और विपक्ष के पार्षदों ने शुल्क को जन विरोधी बताया है। उन्होंने कहा कि सदन में शुल्क का विरोध किया जाएगा। भाजपा पार्षद दल के नेता और उपसभापति नरसिंह दास का कहना है कि जनता इस समय संक्रमण से लड़ रही है। हर व्यक्ति जान बचाने के लिए परेशान है। इस प्रकार का कोई भी कर जनहित में उचित नहीं है। सदन में इसका विरोध किया जाएगा।
कांग्रेस पार्षद दल के नेता सीताराम केशरी का कहना है कि कर लगाने के पीछे नीयत और मंशा ठीक नहीं है। काशी के इतिहास में पहली बार तीर्थ पुरोहित और ब्राह्मणों पर शुल्क लगाने की बात की गई है। यह तानाशाही है। इसका विरोध किया जाएगा।
अव्यवहारिक और अदूरदर्शी सोच का है नतीजा
अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित महासभा के मंत्री पं. कन्हैया त्रिपाठी का कहना है कि यह अव्यवहारिक और अदूरदर्शी सोच का नतीजा है। तीर्थ पुरोहित समाज इस अव्यवहारिक निर्णय का विरोध करेगा। 1916 में जिला मजिस्ट्रेट ने पंजीकरण का आदेश जारी किया था, तब पंडा स्व. कृष्णलाल ने लाइसेंस नहीं लिया था और गिरफ्तारी दी थी।
प्रयागराज उच्च न्यायालय में तीर्थ पुरोहितों का केस पंडित जवाहर लाल नेहरू ने लड़ा था। अदालत ने फैसला सुनाया था कि जिला मजिस्ट्रेट को लाइसेंस देने का अधिकार नहीं है। अब न जानें क्या हुआ कि टैक्स लगा दिया गया।
संस्कृति विरोधी है शुल्क
समाजवादी पार्टी के महानगर अध्यक्ष विष्णु शर्मा ने गंगा घाटों पर शुल्क को संस्कृति विरोधी बताया। उन्होंने कहा कि यह काशी की संस्कृति बर्बाद करने की साजिश है। हम इसका पुरजोर विरोध करेंगे। डॉ. आनंद प्रकाश तिवारी ने कहा कि सांस्कृतिक नगरी का व्यवसायीकरण किया जा रहा है। इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है। महानगर महासचिव जितेंद्र यादव ने सभी राजनीतिक, सामाजिक संगठनों से इसका विरोध करने की अपील की।
गंगा घाटों के रखरखाव के लिए किया गया प्रावधान
गंगा घाटों पर साफ-सफाई और रखरखाव के लिए शुल्क का प्रावधान किया गया है। यह बेहद मामूली शुल्क है जो पुजारियों के लिए रखा गया है। -देवीदयाल, अपर नगर आयुक्त