गांव की कुल आबादी 7000 है और हर घर में कोई न कोई बुखार से पीड़ित है, जिससे ग्रामीणों में डर का माहौल है। ग्रामीणों ने बताया कि काशी विद्यापीठ ब्लॉक स्वास्थ्य केंद्र और मिसिरपुर सीएचसी 12 से 14 किलोमीटर दूर है। इमरजेंसी में मरीजों को ले जाने में काफी दिक्कत होती है। ग्रामीणों ने गांव में ही अस्थायी स्वास्थ्य कैंप लगाने और नियमित फॉगिंग की मांग की है।
गांव के गुलाम रब्बानी (70) की की कुछ दिन पहले ही मौत हो गई। बेटे इरशाद ने बताया कि पिता एक हफ्ते से तेज बुखार से पीड़ित थे। सेंट मैरी हॉस्पिटल में इलाज कराया, लेकिन एक दिन दवा खाने के बाद ही उनकी मौत हो गई। डॉक्टर ने रिपोर्ट में डेंगू और लिवर में सूजन की बात कही। अम्मा नगीना भी अभी बुखार से पीड़ित हैं। एएनएम से लेकर प्रधान तक कई बार छिड़काव के लिए कहा, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। मौतों के बाद ही विभाग जागा है।
जुलेखा उर्फ मद्दर (53) की मौत 2 अक्तूबर को हो गई। भाई अब्दुल करीम ने बताया कि उनकी बहन को ठंड लगकर तेज बुखार आया था। 30 सितंबर को अस्पताल में भर्ती कराया, जहां 2 अक्टूबर को उनकी मौत हो गई। सितंबर में उनके पूरे परिवार के लोग बुखार के कारण अस्पताल में भर्ती हुए थे।
जमालूद्दीन (33) को तेज बुखार था। पिता कलीम अंसारी ने बताया कि बेटे को अचानक तेज बुखार आया। जांच में डेंगू की पुष्टि हुई। मोढ़ैला के निजी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, जहां 2 दिन इलाज के बाद 20 अक्तूबर को उसकी मौत हो गई। 5 साल की बेटी और 8 साल का बेटा भी डेंगू से पीड़ित होकर भर्ती हुए थे। परिवार में कुल 17 सदस्य हैं, जिनमें अधिकांश बीमार हैं।