विश्व पर्यावरण दिवस पर बनारसियों को बदली-बदली काशी नजर आई है। हवा, पानी और वातावरण के निखार से हर कोई चकित है। बात गंगा की करें तो पिछले 50 सालों में गंगा का जल सबसे अधिक शुद्ध हुआ है। वहीं विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों में शुमार काशी अब तो पूरी तरह ग्रीन जोन में है। जहां हवा, पानी और ध्वनि का प्रदूषण नदारद है।
बनारसियों के लिए लॉकडाउन अब तक का सबसे मुश्किल भरा दौर था लेकिन प्रकृति ने इतनी शुद्ध हवा और पानी कभी नहीं दिया था। पिछले 50 सालों में भी गंगा भी इतनी निर्मल कभी नहीं बहीं। पानी का मटमैला रंग अब साफ हो गया है। रंग बदल गया है। वो जलचर भी अब दिखने लगे हैं जिन्हें लुप्त मान लिया गया था।
आंकड़े बताते हैं कि बनारस में गंगा 25 से 30 फीसदी साफ हो चुकी हैं। गंगा के वो जलचर, जो प्रदूषण की भेंट चढ़ते जा रहे थे, सीढि़यों पर तैरने लगे हैं। बीएचयू के नदी वैज्ञानिक प्रो. बीडी त्रिपाठी कहते हैं कि गंगा का पानी साफ हुआ है। लॉकडाउन के बाद गंगा जल में हुए बदलाव का उन्होंने गहन अध्ययन किया है। शायद 50 साल पहले भी बनारस में गंगा इतनी निर्मल नहीं रही होंगी।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय प्रबंधक कालिका सिंह ने बताया कि 15 मार्च को अप स्ट्रीम में पीएच 8.19 और डिजाल्व आक्सीजन की मात्रा 8.8 प्रति मिलीलीटर थी। बीओडी 2.8 और फीकल कॉलीफार्म 2600 एमपीएन प्रति सौ मिलीलीटर था। जबकि डाउन स्टीम में पानी काफी गंदा था।
पीएच 8.34 और डिजाल्व आक्सीजन की मात्रा 8.2 प्रति मिली लीटर और बीओडी की मात्रा 3.7 मिली ग्राम प्रति मिली लीटर और टोटल कालीफार्म 24000 एमपीएन प्रति 100 मिली लीटर रही। इस हद तक निर्मल हो गईं गंगा गंगा जल का ताजा आंकड़ा अप स्टीम में पीएच 8.35 और डिजाल्व आक्सीजन की मात्रा 9.1 प्रति मिली लीटर थी। बीओडी की मात्रा 2.4 मिली ग्राम प्रति मिली लीटर और टोटल कालीफार्म 1300 एमपीएन प्रति 100 मिली लीटर रही। डाउन स्ट्रीम में स्थिति अब काफी बदल गई है।
पूरी तरह बदल गया नदी का रंग
गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के विशेषज्ञ प्रो. बीडी त्रिपाठी के अनुसार सामान्य दिनों में बनारस में हमेशा करीब एक लाख तीर्थयात्री रहते हैं। लॉकडाउन में भीड़ कम है। काशी में शवों के जलने में 40 प्रतिशत से ज्यादा कमी आई है। काशी में सिल्क फैब्रिक और आइवरी वर्क्स की करीब 1200 फैक्ट्रियां हैं। ये फैक्ट्रियां करीब 25 एमएलडी गंदा पानी छोड़ती थीं।
लॉकडाउन की वजह से केमिकलयुक्त पानी अब गंगा में नहीं मिल रहा है। 500 से अधिक मोटर के कारखाने भी बंद हैं। काशी के कई गंगा घाटों को धोबियों ने अपना बना लिया था। कपड़ा धुलाई भी बंद है। पानी का उपयोग और दोहन कम हुआ है। इससे गंगा का प्रवाह बढ़ गया है। इसी वजह से एक मीटर की गहराई तक मछलियां दिख रही हैं। गंगा में गिरने वाले नालों को छोड़ दिया जाए तो बाकी स्थानों पर गंगा 30 फीसदी से अधिक साफ हो गई है।
जलीय जीवों के लिए हुआ अनुकूल
बनारस में करीब 35 नालों से हर रोज 350 मिलियन लीटर गंदा पानी गंगा में जाता है। इसके बावजूद गंगा जल की गुणवत्ता में काफी सुधार हुआ है। गंगाजल में आक्सीजन की मात्रा बढ़ी है और कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा कम हुई है। इस वजह से गंगा जल अब मछलियों और अन्य जलीय जीवों के लिए अनुकूल है।
गंगाजल के निर्मलीकरण का पैमाना
- डीओ यानी डिजाल्व आक्सीजन की मात्रा नदी के पानी में पांच मिलीग्राम प्रति लीटर से ज्यादा होनी चाहिए।
- बीओडी यानी बायोकेमिकल आक्सीजन डिजाल्व की मात्रा नदी के पानी में तीन मिलीग्राम प्रति लीटर से कम होनी चाहिए।
- टीडीएस यानी टोटल डीसॉल्व सॉलिड्स की मात्रा नदी के पानी में 600 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम होनी चाहिए।