सर्वविद्या की राजधानी काशी में महापुरुषों का योगदान भी अतुलनीय है। ऐसे ही महापुरुष थे राष्ट्ररत्न शिवप्रसाद गुप्त की पुण्यतिथि शनिवार को मनाई गई। कोरोना कर्फ्यू के कारण सार्वजनिक आयोजन नहीं हुए।
काशी विद्यापीठ से सेवानिवृत्त प्रो. सतीश राय ने बताया कि राष्ट्रीय आंदोलनों को धार देने के लिए महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ जैसा विश्वविद्यालय, भारत माता मंदिर के साथ ही शिव प्रसाद गुप्त अस्पताल का श्रेय भी इनको जाता है। सुख-सुविधाओं के माहौल में पलते-बढ़ते वे उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय गए तो वहां उन्हें आचार्य नरेंद्र देव व गोविंदवल्लभ पंत आदि का साथ मिला। बाद में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की प्रेरणा से वे कांग्रेस में आए और स्वतंत्रता संघर्ष में सक्रिय हुए।
आगे चलकर बापू ने उनको राष्ट्ररत्न कहना शुरू किया तो वह उनकी पदवी जैसा हो गया। उनका मानना था कि मजहब या धर्म मनुष्य की निजी संपत्ति है और उसे सांसारिक झगड़ों में डालना उसकी पवित्रता व गौरव को नष्ट करना है। अपनी प्रसिद्ध कृति पृथ्वी प्रदक्षिणा में उन्होंने लिखा है कि संसार में जिन भी जातियों ने सांसारिक उन्नति की है, मजहब व दुनिया को अलग रखकर ही की है। गांधी जी से निकटता के कारण पं. जवाहर लाल नेहरू समेत अनेक छोटे-बड़े कांग्रेसी नेता उनसे सहयोग व समर्थन लेने प्राय: बनारस आया करते थे।
1924 से 1931 तक वे कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रहे और इस दौरान 1928 में बनारस में हुई पहली राष्ट्रीय कांग्रेस का उन्होंने अपने निजी खर्च से आयोजन किया। काशी विद्यापीठ के अलावा ज्ञानमंडल, भारत माता मंदिर भी उनके योगदान से स्थापित हुए। शिवप्रसाद गुप्त ने असहयोग आंदोलन के दौरान ज्ञानमंडल प्रकाशन से ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रचार व सामाजिक जागरण के लिए समाचार पत्र का प्रकाशन किया। वे जीवन भर देश की आजादी व चरित्र निर्माण के लिए समर्पित रहे, लेकिन दुर्भाग्य कि आजादी का सूरज देखना उन्हें नसीब नहीं हुआ। 24 अप्रैल 1944 को मृत्यु से हारकर वे इस संसार से चले गए।