चौक थाने के सामने भद्दोमल के छत से महामूर्ख सम्मेलन की शुरुआत हुई थी। तब धर्मशील चतुर्वेदी, भइयाजी बनारसी, चकाचक बनारसी, सांड बनारसी आदि कवियों ने इसका आगाज किया था। दमदार बनारसी ने बताया कि इसके बाद चौक थाने के बाद गंगा पार में भी इसका आयोजन हो चुका है। जब से डॉ. राजेंद्र प्रसाद घाट बना तक से वहीं पर आयोजन हो रहा है।
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अप्रैल फूल डे का था जवाब
अंग्रेज भारत में अपने नववर्ष को ऊंच और हिंदू नववर्ष को नीचे दिखाने के लिए एक अप्रैल को अप्रैल फूल डे कहा करते थे। डॉ. रमेशदत्त पांडेय ने बताया कि तब काशी के विद्वानों और साहित्यकारों ने इसका विरोध हास्य-व्यंग्य से करने का निर्णय लिया था। इसके बाद उन्होंने महामूर्ख सम्मेलन की परंपरा शुरू की। इस मंच को संगठित कर साहित्य, हास्य, कला, जनजागरण का अद्वितीय मंच बनाया।