खेल मैदान में पहाड़ी गांव के बेटियां
- फोटो : रोहित सोनकर
शुरुआत में सिर्फ सात-आठ बच्चे आते थे। उनके लिए कोच भैरव ने किस्तों में किट मंगवाई। यहां-वहां से जूतों के पैसे जुटाए। तीन नेशनल खेल चुकी सृष्टि कहती हैं कि उन्हें पहली किट भैरव सर ने ही दिलवाई थी। वह दूसरों को देखने मैदान पर जाती थी और सोचती थी कि खेल पाऊंगी या नहीं। फुटबाल की इस पीढ़ी को तैयार करते हुए कोच भैरव को 40 साल हो चुके हैं। इस मैदान पर पांच साल की, जो बच्ची खेलने आती थी, अब वह 17 साल की है।
वाराणसी के पहाड़ी गांव में कोच भैरव के साथ फुटबाल खिलाड़ी
- फोटो : रोहित सोनकर
पिथौरागढ़ के भैरव सर वैसे तो वरेका में नौकरी करने काशी आए थे। अब उनके सिखाए बच्चे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी हैं। यही नहीं, अपने खेल के बूते खेल कोटे से नौकरी कर रहे हैं और स्कॉलरशिप पर पढ़ाई भी। एमफिल, बीएड और पीएचडी तक। फिलहाल सात लड़कियां बीएचयू और दो गुवाहाटी से रिसर्च कर रही हैं। तीन प्रोफेसर बन गई हैं। सात पंजाब में स्कॉलरशिप पर पढ़ रही हैं। स्कॉलरशिप की एक शर्त है। पढ़ाई के बदले इन सभी को पदक जीतने होते हैं। कुछ बेटियां ओडिशा व पश्चिम बंगाल के फुटबाल क्लब का हिस्सा हैं।
75 लड़कियां नेशनल खेल चुकी हैं। इनमें लखपति के परिवार के आठ बच्चे हैं। गांव के लोग इस परिवार को लखपति बुलाते हैं, लेकिन गांव में सबसे टूटा-फूटा घर इनका ही है। हां, उनके हिस्से इस गांव के सबसे ज्यादा मेडल जरूर हैं। पार्वती के परिवार में छह बहनें हैं। तीन बहनें फुटबॉलर हैं और दो नेशनल खेल चुकी हैं। जिस ग्राउंड पर इन बच्चों ने सबसे पहले खेलना शुरू किया, वहां अब इमारत बन गई है। जिस गांव में 300 खिलाड़ी हैं, वहां अब मैदान नहीं। खेलने के लिए अब डेढ़ किलोमीटर दूर बरेका जाना होता है।