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दो हजार साल पुराने तिलिस्मी नागकुंड से है पाताल लोक जाने का रास्ता, जानें और क्या हैं मान्यताएं

Sun, 03 May 2020 01:49 PM IST
गीतार्जुन गौतम अमर उजाला नेटवर्क, मिर्जापुर
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तिलिस्मी नागकुंड। - फोटो : अमर उजाला।
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मिर्जापुर जिले के विंध्याचल के कंतित क्षेत्र में दो हजार वर्ष पुराने तिलिस्मी नागकुंड से पाताल लोक जाने का रास्ता है। पाताल यानी नागवंशियों की नगरी। पाताल लोक का रास्ता प्राचीन नगरी पंपापुर है। जो वर्तमान में विंध्याचल में है। शास्त्र में वर्णित है कि पंपापुर नागवंशी राजाओं की राजधानी थी। माता विंध्यवासिनी नागवंशी राजाओं की कुल देवी के रूप में पूजीं जाती थीं।

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मान्यता है कि पाताल लोक से इसी रास्ते नागवंशी आते-जाते थे। कई युगों से प्राचीन विंध्यधरा पर अवस्थित नागकुंड की बावली पांच कुंड के साथ विद्यमान है और पाताल लोक जाने वाले मार्ग को ही नागकुंड के नाम से जाना जाता है। विंध्याचल में मंदिर से पहले कंतित के समीप लाल भैरव मंदिर के ठीक सामने उत्तर दिशा में स्थित नाग कुंड जिसे तिलस्मी कुंड भी कहा जाता है।

लगभग 2200 वर्ष पुराने इस कुंड में स्नान करने से सर्पदोष से मुक्ति मिलती है। इसका उल्लेख बावन पुराण में भी मिलता है। नागकुंड का निर्माण नागवंशी राजा दानवराज ने करवाया था। उस समय विंध्यचाल के आसपास नागवंश का साम्राज्य था। कंतित उनकी उनकी राजधानी हुआ करती थी।

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मांगने पर नागकुंड से जल में तैरते मिलते बर्तन
वामन पुराण के अनुसार राजा की 52 रानियां थी। उन्हीं के स्नान के लिए राजा ने इस कुंड का निर्माण कराया था। चारों तरफ से नीचे उतरने के लिए 52 सीढ़ियों वाले इस कुंड के बारे में जनचर्चा है कि यात्रियों को पुराने समय में कुंड से याचना करने पर उन्हें उपयोग के बर्तन जल में तैरते मिल जाते थे। जिसे उपयोग कर फिर से इसे कुंड में डाल दिया जाता था।

मगर समय के साथ कुंड की यह महिमा समाप्त हो गई। अब तो कुंड के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराने लगा है। कुंड पर  सावन के शुक्ल पक्ष की पंचमी को स्नान करने वाले को अक्षय पुण्य मिलता है। नाग पंचमी में यहां दूर-दूर से दर्शनार्थी नागकुंड के दर्शन व स्नान के लिए आते हैं, पर आज के समय में ऐतिहासिक नागकुंड उपेक्षित है। चारों ओर कूड़े का ढेर लगा है। कभी -कभी समाजिक संस्था के लोग सफाई करते है,पर प्रसाशनिक उपेक्षा के चलते ऐतिहासिक धरोहर इतिहास के पन्ने में सिमट गया है।
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