अगस्त क्रांति के आंदोलन में बनारस जिले में चार स्थानों पर अंग्रेजों ने भारत मां के वीर सपूतों पर गोली चलाई थी। 1942 के आंदोलन में जिले में 20 क्रांतिकारी देश की आजादी के लिए शहीद हुए थे। इन देशभक्तों का भारत मां को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने का जज्बा कम नहीं हुआ।
इसी का नतीजा रहा कि पांच साल बाद 1947 में अगस्त महीने में हम अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों से मुक्त हो गए। 13 अगस्त की शाम कांग्रेसजनों के जुलूस पर पुलिस ने दशाश्वमेध में गोली चलाई गई थी।
तितर-बितर होने के आदेश को दरकिनार करते हुए विंदेश्वरी पाठक तिरंगा लेकर आगे बढ़े और उनकी गिरफ्तारी होने पर पथराव शुरू हो गया था। इस दौरान 26 राउंड गोली चली थी, जिसमें चार शहीद और दर्जनों घायल हुए।
शहीदों में काशी (शिवाला) घटनास्थल एवं अस्पताल में विश्वनाथ (लाहौरी टोला), बैजनाथ प्रसाद (ब्रह्मनाल), हीरालाल (मानमंदिर) का नाम दर्ज हुआ। तीन शहादतें 14 अगस्त को हुईं। इन शहीदों की याद में 14 अगस्त को मशाल जुलूस निकालने की परंपरा कांग्रेस कमेटी ने शुरू की।
धानापुर में कामता प्रसाद विद्यार्थी के नेतृत्व में 16 अगस्त को जुलूस निकाला गया। अंग्रेज पुलिस ने गोली चला दी। इसमें हीरा सिंह, रघुनाथ सिंह, महंगू शहीद हो गए। भीड़ ने अनवारुल हक दरोगा सहित तीन पुलिस कर्मियों को भी मार दिया।
17 अगस्त को चोलापुर में गोली चली। आयर से वीरबहादुर सिंह के साथ जुलूस थाने पहुंचा। इसमें रामनरेश उपाध्याय, निरहू भर, श्रीराम, चौथी नोनिया और पंचम राम शहीद हुए। 28 अगस्त को सैयदराजा में गोली चली। जगत नारायन दुबे ने जुलूस का नेतृत्व किया था।
फेंकू, श्रीधर और रामभरोसे शहीद हुए। इसके अलावा बाबतपुर में विश्वनाथ सिंह, पहाड़ा रेलवे स्टेशन फूंकने में झुलसे बीएचयू के छात्र नरेश सिन्हा, कैलहट स्टेशन फूंकने में इंजीनियरिंग में पढ़ रहे पंजाब के छात्र कश्मीरा सिंह गिरफ्तार हुए।
उन्हें बीएचयू के अस्थायी जेल में रखा गया, जहां कश्मीरा सिंह की मौत हो गई थी। यही नहीं, पुलिस उत्पीड़न एवं यातना के चलते रामगति, सिद्धराज व गिरधारी ने भी जान गंवाई थी।