स्टोरी नंबर -एक और स्टोरी नंबर दो
स्टोरी नंबर -एक
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गांव हमारी ताकत
खानापट्टी गांव की है अलग पहचान
गांव में पूरी तरह वर्जित है मांसाहार
गांव ने दिए हैं स्वतंत्रता सेनानी, विधि वेत्ता मनीषी
विचारक, वैज्ञानिक, इंजीनियर और शिक्षक
अमर उजाला ब्यूरो
सिकरारा। जिला मुख्यालय से 14 किलोमीटर दूर जौनपुर-रायबरेली हाईवे पर बसे खानापट्टी गांव की अलग पहचान है। यहां मांसाहार पूरी तरह वर्जित है। इस गांव के लोगों का रहन-सहन शहरों जैसा है। करीब 600 परिवारों वाला यह गांव कब आबाद हुआ यह तो नहीं पता लेकिन देश की आजादी से पहले यह देहजुरी गांव का हिस्सा था और बाद में स्वतंत्र ग्राम सभा बन गई। तकरीबन 4.5 वर्ग किलोमीटर में फैले इस गांव से सिटी रेलवे स्टेशन की दूरी 12 किलोमीटर है।
सेवानिवृत्त शिक्षक यदुनाथ सिंह बताते हैं कि मुगल काल में गांव की उत्तरी सीमा पर स्थित सई नदी पर शाही पुल बनाया जा रहा था। उसके मजदूर इसी गांव में रुककर खाना बनाते थे। खाना बनाने के कारण ही इस गांव का नाम खाना पट्टी हो गया। गांव की कुल आबादी 4800 है। अलग-अलग मजरों में राजपूत, अहीर, निषाद, पाल, मौर्य, सोनकर, दलित , कुम्हार, कहार तथा ब्राह्मणों जातियों के परिवार आबाद हैं। राजपूतों की संख्या अधिक है। ग्राम प्रधान बैजनाथ यादव बताते हैं कि सभी लोग आपस में मिल जुल कर रहते हैं। कभी कोई संघर्ष नहीं हुआ। गांव के सबसे उम्र दराज व्यक्ति सेवानिवृत्त शिक्षक बैताली राम यादव (88) हैं। गांव का मुख्य व्यवसाय खेती है। इसके अलावा तमाम लोग सरकारी नौकरियों, उद्योग व्यापार से जुड़े हैं। यादव बस्ती में डेरी व पशु पालन होता है। अन्य वर्ग में दैनिक मजदूरी तथा छोटे कारोबार करने वालों की संख्या ज्यादा है। गांव का तीन चौथाई क्षेत्र नदी के किनारे से लगा है । अधिकतर लोग परंपरागत ही खेती करते हैं। गांव में 20 कुएं, 31 निजी नलकूप, 325 इंडिया मार्का हैंडपंप तथा 12 ट्रैक्टर हैं। 1967 में सिंचाई के लिए लगा सरकारी नलकूप बरसों से खराब पड़ा है। इस गाँव में एक परिषदीय प्राथमिक विद्यालय तथा एक बालिका इंटर कालेज व इसी से जुड़ा जूनियर हाई स्कूल तथा एक आईटीआई है।
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अमेरिका और कनाडा में हैं खानापट्टी के लोग
सिकरारा। खानापट्टी गांव के इंजीनियर सुशील कुमार सिंह अमेरिका के मिशिगन और शिवेंद्र सिंह कनाडा के टोरंटो में सेवा दे रहे हैं। वैज्ञानिक घनश्याम सिंह अफ्रीका में थे। वहां से लौटकर उत्तराखंड आ गए हैं। डॉ. पीके सिंह बीएचयू व डॉ. सचिन सिंह गोरखपुर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। डॉ अनिल कुमार यादव एस पी महाविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। गांव के 12 से अधिक युवक सेना में कार्यरत हैं। वीरेंद्र सिंह बताते हैं कि गांव में शिव मंदिर, देवी मंदिर, श्री राम जानकी मंदिर, विश्वंभर नाथ धाम, बजरंग बली धाम सहित नौ मंदिर हैं। इसमें श्री राधा कृष्ण मंदिर भव्य है। ग्राम देवता डीह बाबा (ब्रह्म बाबा) धाम भी आस्था का प्रमुख केंद्र है। खानापट्टी की रामलीला पूरे जिले में मशहूर है। सेवानिवृत्त डाक पाल ओमनाथ सिंह बताते हैं कि गांव के मशहूर रंगकर्मी तथा पूर्व सब रजिस्ट्रार स्वर्गीय ब्रज मोहन सिंह ने लगभग 75 वर्ष पूर्व मंडली का गठन किया था।
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हर साल मनाया जाता है खानापट्टी महोत्सव
सिकरारा। मुंबई में कारोबार चलाने वाले दिनेश सिंह के संयोजन में हर साल वासंतिक नवरात्र के समापन पर खानापट्टी महोत्सव मनाया जाता है जिसमें गॉव का हर परिवार यहाँ होने वाले ग्राम देवता की विशेष पूजा, हवन तथा सहभोज में सक्रिय सहयोग करता है। आजादी की लड़ाई में भी यहां के लोगों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था। गांव में तीन स्वतंत्रता सेनानी थे। शिवब्रत सिंह, रामचंद्र सिंह खजांची और रामचंद्र दक्षिणपट्टी सभी दिवंगत हो गए। पूर्व शिक्षक गुलाल सिंह ने बताया कि काफी पहले एक संत ने एक परिवार में भोजन करने के बाद आशीर्वाद दिया था कि गांव के जिस भी परिवार में मांसाहार वर्जित रहेगा वहां सुख शांति कायम रहेगी अन्यथा की स्थिति ठीक नहीं होगा। लोग आज भी उस पर कायम है।
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चकबंदी बनी विकास में बाधक
सिकरारा। ग्राम प्रधान बैजनाथ यादव का कहना है कि इस गांव के विकास में सबसे बड़ी बाधा तीन चौथाई क्षेत्र में चकबंदी न होना है। इस क्षेत्र को सई नदी का किनारा तथा उससे जुड़े नालों के कारण चक आउट कर दिया गया था। इसके कारण खड़ंजा, चक मार्ग नाली आदि की अवस्थापना नहीं हो पा रही है। गांव के गायघाट, निषाद बस्ती तथा नदी के किनारे की पाल बस्ती में विद्युतीकरण नहीं हो पाया है। यहां पात्र गृहस्थी के 269 तथा अंत्योदय के 76 कार्ड धारक हैं । वैसे कुल लाभार्थी 1377 हैं। मनरेगा के तहत 150 पुरुष तथा 20 महिला जॉब कार्ड धारक हैं।
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