गंगा घोर संकट में हैं...तस्वीर उससे भी भयावह है। इस साल अभी ठीक से गर्मी भी नहीं आई, जल तलहटी में पहुंच गया है। आगे क्या स्थिति बनेगी यह सोच कर ही रूह कांप जाती है। कारण कि हजारों साल पौराणिक काशी का वजूद ही गंगा से है, गंगा है तो काशी है। गंगा है तो पांच राज्यों के 2550 किलोमीटर उसके क्षेत्र में जीवन है...मोक्ष है...रोजी-रोटी है।
‘सरकारी’ नजरिए भी कुछ ऐसा है कि जब जरूरत हो तो किसी बांध से थोड़ा पानी छोड़ दिया जाए। यह चिंता ही नहीं चेतने की बात है, वरना...हमारी संस्कृति, सभ्यता और जीवन सब चीत्कार करेंगे। गंगा को लेकर शोर के बजाए सही योजनाओं पर आना ही होगा...स्वच्छता-निर्मलता से आगे हमें सबसे पहले उसकी अविरलता के बारे में कोई सार्थक-कारगर पहल करनी ही होगी, नहीं तो सभी योजनाएं बस मुंह ही चिढ़ाती रहेंगी।
अमर उजाला संवाद में आए विद्वानों और विशेषज्ञों ने ऐसे ही तीखे लहजे में चेताया है।
गंगा को स्वच्छ रखने के लिए सरकारी योजनाएं केवल फाइलों तक ही सिमटी हुई हैं। हालत यह हो गई है कि सात दशक बाद गंगा की हालत काशी में बदहाल हो चुकी है। काशी में गंगा का घटता जलस्तर और घाटों को छोड़ रही गंगा चिंता का सबब बन चुकी हैं।
हालात यही रहे तो गर्मियों में काशी वासियों को भयानक जलसंकट का सामना करना पड़ सकता है। हाल तो यह है कि ज्यों-ज्यों दवा की मर्ज बढ़ता चला गया। मोक्षदायिनी को अब खुद ही गंगाजल की जरूरत है।
संकट मोचन फाउंडेशन के महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र का कहना है कि गंगा एक्शन प्लान में बस समस्या पर बात हो रही है लेकिन समाधान के बारे में कोई विचार नहीं करता है। गंगा की जिम्मेदारी पूरी तरह से सरकार की है। प्राकृतिक अविरलता अगर बनी रही तो सभी समस्याएं स्वत: दूर हो जाएंगी।
गंगा में गिरने वाला सीवर इसके प्रदूषण के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है। हमें यह जिम्मेदारी लेनी होगी कि मां गंगा के घाटों को मंदिरों के गर्भगृह की तरह स्वच्छ रखें। राष्ट्रीय नदी तो घोषित कर दिया लेकिन उसके संरक्षण के क्या उपाय होंगे इसके बारे में कोई नीति नहीं बनाई गई।