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विद्वानों और विशेषज्ञों ने कहा, चेतो...वरना जीवन-संस्कृति चीत्कार उठेंगे

Tue, 01 May 2018 03:22 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
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अमर उजाला संवाद में आए विद्वान और विशेषज्ञ - फोटो : अमर उजाला
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गंगा घोर संकट में हैं...तस्वीर उससे भी भयावह है। इस साल अभी ठीक से गर्मी भी नहीं आई, जल तलहटी में पहुंच गया है। आगे क्या स्थिति बनेगी यह सोच कर ही रूह कांप जाती है। कारण कि हजारों साल पौराणिक काशी का वजूद ही गंगा से है, गंगा है तो काशी है। गंगा है तो पांच राज्यों के 2550 किलोमीटर उसके क्षेत्र में जीवन है...मोक्ष है...रोजी-रोटी है।

‘सरकारी’ नजरिए भी कुछ ऐसा है कि जब जरूरत हो तो किसी बांध से थोड़ा पानी छोड़ दिया जाए। यह चिंता ही नहीं चेतने की बात है, वरना...हमारी संस्कृति, सभ्यता और जीवन सब चीत्कार करेंगे। गंगा को लेकर शोर के बजाए सही योजनाओं पर आना ही होगा...स्वच्छता-निर्मलता से आगे हमें सबसे पहले उसकी अविरलता के बारे में कोई सार्थक-कारगर पहल करनी ही होगी, नहीं तो सभी योजनाएं बस मुंह ही चिढ़ाती रहेंगी। अमर उजाला संवाद में आए विद्वानों और विशेषज्ञों ने ऐसे ही तीखे लहजे में चेताया है।
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गंगा को स्वच्छ रखने के लिए सरकारी योजनाएं केवल फाइलों तक ही सिमटी हुई हैं। हालत यह हो गई है कि सात दशक बाद गंगा की हालत काशी में बदहाल हो चुकी है। काशी में गंगा का घटता जलस्तर और घाटों को छोड़ रही गंगा चिंता का सबब बन चुकी हैं।

हालात यही रहे तो गर्मियों में काशी वासियों को भयानक जलसंकट का सामना करना पड़ सकता है। हाल तो यह है कि ज्यों-ज्यों दवा की मर्ज बढ़ता चला गया। मोक्षदायिनी को अब खुद ही गंगाजल की जरूरत है।

संकट मोचन फाउंडेशन के महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र का कहना है कि गंगा एक्शन प्लान में बस समस्या पर बात हो रही है लेकिन समाधान के बारे में कोई विचार नहीं करता है। गंगा की जिम्मेदारी पूरी तरह से सरकार की है। प्राकृतिक अविरलता अगर बनी रही तो सभी समस्याएं स्वत: दूर हो जाएंगी।

गंगा में गिरने वाला सीवर इसके प्रदूषण के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है। हमें यह जिम्मेदारी लेनी होगी कि मां गंगा के घाटों को मंदिरों के गर्भगृह की तरह स्वच्छ रखें। राष्ट्रीय नदी तो घोषित कर दिया लेकिन उसके संरक्षण के क्या उपाय होंगे इसके बारे में कोई नीति नहीं बनाई गई।

गंगा के मौलिक गुणों पर छाया संकट

जलस्तर में कमी से सामनेघाट के पास मध्य धारा में भी जगह जगह रेत के टीले उभर आये हैं - फोटो : अमर उजाला
नदी विज्ञानी बी.डी. त्रिपाठी का कहना है कि गंगा की वर्तमान स्थिति पर गंभीरता से विचार करना होगा। गंगा अब ‘भागीरथ पथ’ की बजाय दूसरे मार्ग से बहने लगी हैं इस कारण उनके मौलिक गुणों पर भी संकट खड़ा हो गया है। प्रदूषण के मानक और परिभाषा पर हमें फिर से विचार करना होगा। 1986 में पुरानी तकनीक पर बने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से ही काम चलाया जा रहा है। ऊर्जा के अन्य विकल्पों पर भी विचार करना होगा। जलप्रवाह कम होने से गंगा में गाद बढ़ रही है और घुलनशील क्षमता भी समाप्त हो रही है। समस्या कुछ और है और समाधान कुछ और हो रहा है।

समृद्ध भारत न्यास परिषद के डॉ. वाचस्पति त्रिपाठी का कहना है कि सरकारें अगर गंगा की उपयोगिता लोगों को बताएं तो लोग स्वयं जागरूक होंगे। उसकी मूल प्रकृति से छेड़छाड़ के कारण ही बीमारियां बढ़ रही हैं। यही हाल रहा तो संक्रमण विकराल रूप धारण कर लेगा। गंगा समाप्त हो गई तो काशी का आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक जीवन समाप्त हो जाएगा।

शिया जामा मस्जिद के प्रवक्ता फरमान हैदर का कहना था कि घर पर बैठने से बात नहीं बनेगी। देश में सभी राष्ट्रीय चीजों का यही हाल है। अब तो गंगा भी आवाज दे रहीं मुझे पानी पिला दीजिए..।  सोचने वाली बात है कि बांध बनाकर तो बहुत बिजली खर्च कर ली लेकिन गंगा को बचाने के लिए कितना पैसा खर्च हो गया। गंगा को बचाने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति और सख्त कानून की जरूरत है।

नमामि गंगे के संयोजक राजेश शुक्ला का कहना था कि गंगा पर संकट होने से सनातनी संस्कृति भी खतरे में पड़ जाएगी। राजमंदिर के पूर्व सभासद घनश्याम सिंह का कहना था कि गंगा के नाम पर आंदोलन तो बहुत चले लेकिन गंगा के हालत में सुधार नहीं हुआ। राजघाट से रामनगर तक गंगा में सीधे गंदगी गिर रही है लेकिन कोई सुध लेने वाला नहीं है।
 
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गंगा को बचाने सभी धर्मों को आगे आना होगा

वाटर मैनेजमेंट की पढ़ाई नहीं प्रयोग भी हो
देेश में वाटर मैनेजमेंट के जो कोर्स संचालित हो रहे हैं उन्हें केवल शिक्षा के रूप में प्रयोग न किया उनका प्रयोग नदियों पर किया जाए। सही मायने में गंगा पर उसका जरूर होना चाहिए, ताकि राष्ट्रीय धरोहर को बचाया जा सके।
प्रो. विश्वमंभर नाथ मिश्रा, महंत संकट मोचन

सहायक नदियों पर बनाए जाए बांध
गंगा की मुख्य धारा को बंद करने की बजाय उसमें मिलने वाली सहायक नदियों पर बांध बनाया जाए, जबकि मुख्य धारा को छोड़ दिया जाए। इससे गंगा की अविरलता बनी रहेगी और गंगा न तो प्रदूषित होंगी और नहीं उसमें जल की कमी होगी।
डॉ. बीडी त्रिपाठी, नदी वैज्ञानिक

बांधों की कमाई से अधिक बीमारियों पर खर्च
गंगा जल के बैक्टीरिया लोगों के अंदर प्रतिरोधक क्षमता पैदा करते हैं। जितना गंगा के बांधों से सरकार पैसा नहीं कमा पाती है उससे अधिक लोगों के स्वास्थ्य के लिए खर्च कर देती है। इसलिए स्वास्थ्य विभाग को ध्यान देेना चाहिए।
डॉ. वाचस्पति त्रिपाठी, जल वैज्ञानिक

गंगा को बचाने सभी धर्मों को आगे आना होगा
गंगा केवल हिंदुओं की नहीं है, वह सभी धर्मों की पवित्र नदी हैं। सभी के लिए लाइफ लाइन का काम करती हैं। इसलिए सभी कोे एकजुट होेकर आगे आना होगा, तब गंगा को बचाया जा सकेगा।
फरमान हैदर, शिया जामा मस्जिद के प्रवक्ता

लोगों में जागरूकता लाने की जरूरत
गंगा को स्वच्छ, अविरल और निर्मल रखने के लिए लोगों में जागरूकता की आवश्यकता है। फूल, पत्ती, कपड़ा और प्लास्टिक डालने वालों को इसके लिए नुकसान बताना होेगा। तब जाकर गंगा को स्वच्छ  बनाने में पूरा सहयोग किया जा सकता है।
राजेश शुक्ला, नमामि गंगेे

बांधों को हटाए बिना अविरलता संभव नहीं
गंगा पर बनाये बांधों ने ही उसकी यह हालत की है। बिना बांधों के हटाए कितनी भी कोशिश कर ली जाए कुछ भी होने वाला नहीं। निर्मल-अविरल की सब योजनाएं बेमानी हैं। इस तरह काम होगा तो गंगा कभी भी साफ नहीं हो सकेंगी।
घनश्याम सिंह, पूर्व पार्षद
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