वाराणसी। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रो. आनंद कुमार त्यागी ने कहा कि भाषा का सवाल आज इसलिए भी प्रासंगिक हो जाता है क्योंकि इसे किसी भौगोलिक या राजनैतिक सीमा में बांधा नहीं जा सकता। कोई भी ज्ञान परंपरा कभी सत्ता सापेक्ष नहीं होती। खास तौर पर भारत में बोली जाने वाली सभी भाषाएं परस्पर आपस में एक जैसी प्रतीत होती हैं।
वह बुधवार को भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय भारत सरकार एवं हिंदी और अन्य भारतीय भाषा विभाग की चार दिवसीय कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं का मूल एक ही है। पश्चिमी देशों ने अपने शासन व्यवस्था को आसान बनाने के लिए भारत में भाषायी भिन्नता का बोध कराया। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारत की संपर्क भाषा एक ही थी। मुख्य अतिथि प्रो. राजकुमार ने बताया कि भारतीय ज्ञान परंपरा में पूर्व और उसका खंडन करने वाला उत्तर पक्ष दोनों विद्यमान है। प्रो. अवधेश कुमार मिश्रा ने कहा कि भारतीय भाषाओं में अलगाव का काम अंग्रेजों ने दो-ढाई सौ साल पहले किया। विभागाध्यक्ष प्रो. निरंजन सहाय ने कहा कि कार्यशाला को अकादमिक लेखन में रूपांतरित कर भारत के विभिन्न पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनाया जाएगा। संचालन डॉ. अविनाश कुमार सिंह और धन्यवाद डॉ. विजय कुमार रंजन ने की।