फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

...तो लग जाएगी पूर्वांचल की लॉटरी

Sat, 11 Mar 2017 02:21 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
विज्ञापन
यूपी चुनाव 2017 - फोटो : SELF
विज्ञापन
विधानसभा चुनाव के लिए मतदान से पहले सपा-कांग्रेस गठबंधन की ओर से जहां अगले मुख्यमंत्री पद के लिए अखिलेश यादव के नाम पर कोई शक नहीं था, वहीं इस पद के लिए बसपा में मायावती का नाम सर्व विदित है। भाजपा ने मुख्यमंत्री पद के लिए कोई नाम घोषित नहीं किया था। भाजपा ने पूरा चुनाव पीएम नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ा है। यही वजह है कि एग्जिट पोल सामने आने के बाद कयासों का दौर शुरू हो गया है। जानकारों को पूर्वांचल से मुख्यमंत्री बनने की अटकलों में दम लगता है। उनका मानना है कि यदि ओबीसी कैटेगरी से मुख्यमंत्री पद के लिए चुनाव होता है तो पूरव की संभावना और बढ़ जाएगी।  
विज्ञापन

28 अक्तूबर, 2000 से 8 मार्च, 2002 तक पूर्वांचल से जुड़े गृह मंत्री राजनाथ सिंह आखिरी बार मुख्यमंत्री बने थे। इससे पहले पूर्वांचल को यह मौका 24 सितंबर, 1985 से 24 जून, 1988 तक मिला था, जब वीर बहादुर सिंह ने मुख्यमंत्री पद संभाला था। 15 साल बाद पूर्वांचल के लोगों की उम्मीद की वजह है। भाजपा के बड़े नेताओं का मानना है कि 2007 में बसपा को खुले दिल से समर्थन देने वाले पूर्वांचल ने ही 2012 में सपा को एकतरफा जीत दिला दी। इस बार के चुनाव में भाजपा ने आक्रामक प्रचार और सधी हुई रणनीति के सहारे सपा और बसपा के चिह्नित वोट बैंक को और मजबूत करने वाले वोटों में सेंधमारी कर दी है।
 
  भाजपा ने पूर्वांचल को फतह करने के लिए प्रचार अभियान में सहारनपुर से सोनभद्र तक भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य और केंद्रीय मंत्री उमा भारती को आगे कर पिछड़ों को साधने की कोशिश की। अगड़ों को अपने पक्ष में करने के लिए पूर्वांचल के केंद्रीय मंत्रियों राजनाथ सिंह और कलराज मिश्र को पूरे प्रदेश में समान भाव से स्टार प्रचारक बनाया गया। पश्चिम में राजनाथ और कलराज का खासा प्रभाव नहीं माना जाता है। उमा भारती भी वहां बहुत लोकप्रिय नहीं हैं। हालांकि उमा भारती तो पूर्वांचल से ताल्लुक नहीं रखती हैं पर फूलपुर से सांसद मौर्य को उत्तर प्रदेश की भौगौलिक स्थितियों के हिसाब से पूर्वांचल का ही माना जाता है।
विज्ञापन


 
 
बसपा ने पूर्वांचल को अलग राज्य बनाने का वादा किया है तो भाजपा पूर्वांचल विकास बोर्ड के जरिए यहां विकास कार्यों को रफ्तार देना चाहती है। सपा के पूर्व सीएम मुलायम सिंह यादव ने पूर्वांचल विकास निधि की शुरुआत की थी। इस चुनाव में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव लखनऊ से बलिया को जोड़ने के लिए पूर्वांचल एक्सप्रेस वे पर काम शुरू कराने के साथ-साथ वाराणसी में मेट्रो चलाने का वादा किया है। इस इलाके में पत्थर और कोयला की उपलब्धता के अलावा बिजली परियोजनाओं की यहां बहुतायत है। साड़ी, कालीन, दरी, पॉटरी व्यवसाय में भी यहां का दबदबा है। धर्मस्थलों और पर्यटन स्थलों की भी कमी नहीं है पर अपराधियों के हौसले भी उतने ही बुलंद हैं।
 
 
चर्चा में प्रमुख नाम ः भाजपा की सरकार बनने पर मुख्यमंत्री पद के लिए मौर्य, राजनाथ, कलराज के अलावा रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा से लेकर गोरखपुर के सांसद महंत आदित्यनाथ के नाम चर्चा में हैं। मौर्य के नाम पर पार्टी आलाकमान का ज्यादा भरोसा बताया जाता है। इसकी वजह केंद्र में मोदी की सरकार बनने के बाद भाजपा ने राजस्थान में बसुंधरा राजे, झारखंड में भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे रघुवर दास को मुख्यमंत्री पद की कमान दी गई है। समर्थक और विश्लेषक इसी आधार पर उनकों प्रमुख दावेदार मान रहे हैं। माना जा रहा है कि पूर्ण बहुमत के आंकड़े में कमी की सूरत में ही राजनाथ या कलराज का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाया जा सकता है। गौरतलब पहलू यह भी है कि सभी स्टार प्रचारक सांसद हैं और किसी ने भी विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ा है।
 
 
  इन मुख्यमंत्रियों ने बढ़ाया मान ः वाराणसी, आजमगढ़, मिर्जापुर, गोरखपुर और बस्ती मंडल के आंशिक भाग को पूर्वांचल माना जाता है। इसमें विधानसभा की एक चौथाई सीटें आती हैं। यदि इलाहाबाद और समूचे बस्ती मंडल को इसमें शामिल मान लिया जाए तो इसमें 25 से अधिक जिले और विधानसभा की 150 से अधिक सीटें आ जाती हैं। इस इलाके से अब तक डॉ. संपूर्णानंद, टीएन सिंह, पं. कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा, रामनरेश यादव, वीपी सिंह, श्रीपति मिश्र, वीर बहादुर सिंह और राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री रह चुके हैं। इन मुख्यमंत्रियों ने पूर्वांचल का खास ख्याल रखा है। पं. कमलापति त्रिपाठी को वाराणसी से लेकर चंदौली और मिर्जापुर तो गोरखपुर मंडल में वीर बहादुर सिंह को आज भी याद किया जाता है।
विज्ञापन

 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें