फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

खिलाड़ी को जिन्होंने दिलाया नाम, वो कर रहे दूसरे काम

विज्ञापन
विज्ञापन
खेल प्रशिक्षक यानी कोच उस मूर्तिकार की तरह होता है जो सामान्य सी शिला को अपनी मेहनत से तराशकर एक आकर्षक रूप देता है। कुछ ऐसा ही काशी के प्रशिक्षकों ने कर दिखाया है। जिन्होंने छोटे-छोटे जिलों व कस्बों से आए कई खिलाड़ियों को हुनर को संवारकर अंतरराष्ट्रीय फलक का चमकीला सितारा बना दिया। लेकिन वर्तमान में कई ऐसे कोच हैं, जो या तो गुमनाम हो गए या अपने पेशे को छोड़कर अन्य काम की तलाश कर रहे हैं। इसकी प्रमुख वजह खेल प्रशिक्षकों काम और सम्मान न मिल पाना है।
विज्ञापन

आलम यह है कि बीते दो साल से सिगरा और लालपुर स्टेडियम में 20 अंशकालिक प्रशिक्षकों की बहाली न होने से कई प्रशिक्षक प्रशिक्षण छोड़कर दूसरे काम में लगे हुए हैं। जबकि कई अभी तक काम ढूंढ रहे हैं। प्रशिक्षक बताते हैं कि टोक्यो ओलंपिक में पदक विजेताओं को तो सरकार प्रोत्साहित और सम्मानित कर रही, लेकिन उनकों इस मुकाम तक पहुंचाने वाले प्रशिक्षकों का सम्मान तो दूर, रोजगार देने तक की पहल नहीं की गई। प्रशासन की अनदेखी से क्रिकेट, बास्केटबाल, वॉलीबाल, हॉकी, जिमनास्टिक, कुश्ती, हैंडबाल, मुक्केबाजी के प्रशिक्षक बेरोजगार बैठे हैं।
बिन प्रशिक्षक अभ्यास कर रहे खिलाड़ी
सिगरा स्टेडियम में पिछले सत्र 2019-20 में 16 खेलों के खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के लिए 20 प्रशिक्षक थे। इनमें चार विभागीय प्रशिक्षक हैं और 16 अंशकालिक के तौर पर तैनात थे। कोरोना की वजह 2020-21 के लिए अंशकालिक प्रशिक्षकों को दोबारा बहाल नहीं किया गया। इसके चलते सिगरा स्टेडियम और लालपुर में मात्र दो कोच फुटबाल और हॉकी का प्रशिक्षण दे रहे हैं। जबकि कुश्ती, कबड्डी, हैंडबॉल, वालीबाल, एथलेटिक्स, बास्केटबाल सहित कई खेलों के खिलाड़ी बगैर कोच के ही अभ्यास करने को मजबूर हैं।
विज्ञापन

केस 1
बिर्दोपुर निवासी 40 वर्षीय खोखो प्रशिक्षक अनिरुद्ध सिंह बहाली की आस में प्रशिक्षण का काम छोड़कर बिजली का काम करके परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं। जबकि उन्होंने गोविंद यादव, कविता पटेल जैसे कई राष्ट्रीय खिलाड़ियों को तैयार किया।
केस 2
सिगरा में पहलवानों को प्रशिक्षित करने वाले गोरख यादव प्रशिक्षण छोड़कर अब दूध बेचने रहे हैं। जबकि उन्होंने पूजा यादव, मनीषा जैसी अंतरराष्ट्रीय और रोहित, विकास और बृजेश जैसे कई राष्ट्रीय पहलवानों को तैयार किया।
छलका प्रशिक्षकों का दर्द
सिगरा स्टेडियम में विजय और सुभाष जैसे सैकड़ों राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों को प्रशिक्षित किया। अब 58 वर्ष की उम्र में काम ढूंढ रहा हूं, ताकि घर का खर्च चल सके। -लाल कुमार, जूडो प्रशिक्षक
टोक्यो ओलंपिक में प्रतिभागी खिलाड़ियों का तो सम्मान हुआ, लेकिन प्रशिक्षकों को सरकार भूल गई। खिलाड़ियों को गढ़ने वाले प्रशिक्षकों पर भी सरकार को ध्यान देना चाहिए। -छोटे लाल, प्रशिक्षक मुक्केबाजी
देश को नीरज चोपड़ा व शिवपाल जैसे और एथलीट चाहिए तो प्रशिक्षकों पर भी सरकार ध्यान दे। तीन साल से सिगरा स्टेडियम में कई खेलों के प्रशिक्षक नहीं हैं। -चंद्रभान यादव, प्रशिक्षक एथलेटिक्स
लॉकडाउन हटने के बाद उम्मीद थी दोबारा बहाली होगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हालात ऐसे हैं कि खर्च चलाने के लिए तीन महीने से साड़ी बेचकर खर्च चला रहा हूं। -रोहित सिंह, प्रशिक्षक, बैडमिंटन
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें