काशी के इतिहास को संजोए लाल खां के मकबरे की हालत अच्छी नहीं है। देखरेख के अभाव में मकबरे की दीवारें दरक गईं और चबूतरा चिटक गया है। गौरतलब है कि भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग द्वारा कई सालों से लाल खां के रौजे की वास्तविक स्थिति का जायजा नहीं लिया गया है।
राजघाट में गंगा के तट पर मौजूद लाल खां का रौजा खुद में सदियों का इतिहास समेटे हुए है। पुरातत्वविदों का कहना है कि रौजे के नीचे ही काशी की राजधानी के राज भी दफन हैं। विभाग की खुदाई में काशी की प्राचीन इतिहास और संस्कृति के बारे में ढेरों जानकारियां भी मिली थीं। वर्तमान हालत की बात करें तो लाल खां के मकबरे के चबूतरे के पत्थर जगह-जगह से टूट गए हैं। मकबरे की बाहरी दीवारों पर सीलन लगने के कारण काई जमी है और गुंबद समेत उसके नीचे की दीवारें जगह-जगह से चिटक गई हैं। गुंबद के ऊपर बनी छतरियां टूट गई हैं। दूसरी तरफ रौजे में स्थित सदियों पुराने पुरातात्विक अवशेष भी मौसम की मार से मूल स्वरूप को खोते जा रहे हैं।
पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने की योजना
भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग और पर्यटन विभाग की ओर से लाल खां के रौजा को पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने की योजना है। इसके लिए रौजा के दूसरी छोर पर बुकिंग काउंटर, शौचालय और अन्य निर्माण कराए जा रहे हैं। कोरोना और लॉकडाउन के कारण कुछ माह से निर्माण बंद था।
लाल खां की इच्छा थी मृत्यु के बाद भी महल के चौखट का कर सकें दीदार
सेनापति लाल खां की इच्छा थी कि व मृत्यु के बाद भी महल के चौखट का दीदार कर सके। उनकी इच्छा अनुसार 1773 ई. में तत्कालीन काशी नरेश ने राजघाट क्षेत्र में गंगा के तट पर मालवीय पुल के पास लाल खां का रौजा बनवाया और यहीं पर लाल खां को दफन किया गया। उनके अलावा यहां उनके परिवार के दो और सदस्यों की मजारें भी मौजूद हैं। इस मकबरे की वास्तु संरचना पर मुगलकालीन वास्तुकला का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।