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नागरी प्रचारिणी के कोष से निकलेगा सृजन का सागर

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हिंदी को सर्वोत्कृष्ट स्थान दिलाने वाली नागरी प्रचारिणी सभा के दिन भी अब जल्द बहुरेंगे। सभा में चुनाव कराने के निर्णय का साहित्य समाज ने स्वागत किया है। हर किसी का कहना है कि नागरी के कोष से सृजन का सागर निकलेगा और हिंदी जगत को अपनी ज्ञानधारा से अभिसिंचित करेगा। 60 के दशक से प्रचारिणी के गौरव का पराभव होने लगा था।
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साहित्यकार डॉ. इंदीवर पांडेय ने कहा कि इस निर्णय से कुछ उम्मीद तो जगी है। नागरी प्रचारिणी का गौरवशाली इतिहास रहा है। हिंदी भाषा को न्यायालयाें की भाषा बनाने में नागरी का योगदान अविस्मरणीय है। उम्मीद है कि नई शुरुआत में हिंदी के सृजन के नए मील के पत्थर स्थापित होंगे। सभा से बाबू श्याम सुंदर दास, लाला भगवानदीन, बालकृष्ण भट्ट, रामचंद्र शुक्ल, रामचंद्र वर्मा, अमीर सिंह, जगनमोहन वर्मा जैसे शीर्ष विद्वान जुड़े रहे। उनकी थाती नई पीढ़ी को नए कलेवर में प्राप्त होगी।
डॉ. पांडेय ने कहा कि बेढब बनारसी के बाद नागरी प्रचारिणी का क्षरण होने लगा और यह पारिवारिक संस्था बनकर रह गई। फिर भी सुधाकर पांडेय के जमाने तक शोध छात्रों का जमावड़ा होता था, लेकिन उनकी मौत के बाद यह संस्था पूरी तरह से पारिवारिक हो गई। चुनाव कराने से पहले संस्था में एक रिसीवर बैठा देना चाहिए था जो संविधान के अनुसार नई सदस्यता का निर्धारण करता। नए आदेश के अनुसार 2007 की सूची से ही चुनाव कराए जाएंगे तो वही पुराने लोग फिर से काबिज हो सकते हैं।
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हरिश्चंद्र महाविद्यालय के डॉ. उदयन मिश्र ने कहा कि नागरी प्रचारिणी में चुनाव कराने का निर्णय स्वागतयोग्य है। बनारस के इस गौरव को पुन: स्थापित करने की जरूरत है। लंबे समय से चल रहे विवाद की परिणिति सुखद है। हम उम्मीद करते हैं कि इससे हिंदी के उत्थान में मदद मिलेगी। अगर सरकार का सहयोग मिलेगा तो इसमें और भी सुधार आएगा।
कालपात्र से निकलेगा प्रचारिणी का प्राचीन इतिहास
साहित्यकार व्योमेश शुक्ला ने बताया कि 1893 में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई और उसके 50 साल 1943 में पूरे हुए। बड़ा समारोह हुआ। उस समय के कर्ताधर्ताओं को मालूम था कि आगे गड़बड़ हो सकती है। उन्होंने ऐतिहासिक ब्यौरे और बौद्धिक सामग्री का पूरा विवरण एक कालपात्र में रखकर ठीक स्थापना स्थल पर बने चबूतरे के नीचे जमीन के नीचे दफन कर दिया। मेरा सुझाव है कि वह कालपात्र निकाला जाए और उसमें रखे गए ब्योरों के हिसाब से आज की तारीख में सभा में उपलब्ध बौद्धिक संपदा का मिलान (इंटेलेक्चुअल ऑडिट) किया जाए तो बहुत सारे खुलासे होंगे।
- नागरी प्रचारिणी सभा से बहुत सी दुर्लभ पांडुलिपियाँ, हस्तलिखित हिंदी ग्रंथ और ऐतिहासिक महत्व के दस्तावेज गायब कर दिए गए हैं। बहुत से कागजात रखरखाव के अभाव में भी नष्ट हो गए हैं।-व्योमेश शुक्ला, साहित्यकार
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करोड़ों अनुदान के बाद भी कर्मचारियों का वेतन डेढ़ हजार
प्रगतिशील लेखक संघ ने फै सले का किया स्वागत
हिंदी समाज के प्रबुद्ध लोगों से आगे आने का किया आह्वान
वाराणसी। प्रगतिशील लेखक संघ ने नागरी प्रचारिणी सभा में चुनाव कराए जाने के फैसले का स्वागत किया है। संघ के अध्यक्ष डॉ. गोरखनाथ ने बताया कि डॉ. सुधाकर पांडेय जब मंत्री बने तो उसके बाद संस्था की अधोगति शुरू हो गई। इस दौरान यहां से प्रकाशित दुर्लभ पांडुलिपियां और पुस्तकें गुम होने लगीं। बहुत सी विदेशी संस्थानों को बेच दी गईं।
डॉ. गोरखनाथ ने आरोप लगाते हुए कहा कि भारत सरकार से करोड़ों रुपये का अनुदान मिलने के बाद भी कर्मचारियों को डेढ़ से दो हजार रुपये वेतन ही दिया जाता है। कोरोनाकाल में अनेक कर्मचारी वेतन के अभाव में भुखमरी के शिकार हो कर पलायन कर गए। परिवार की मनमानी ने इस गौरवशाली सभा को तबाह करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। नए सिरे से चुनाव के फैसले पर हिंदी समाज के प्रबुद्ध एवं जनपक्षधर लोगों को भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी। उम्मीद की जा सकती है कि आप सभी के सहयोग से नागरी प्रचारिणी सभा का खोया हुआ गौरव फिर से हम सब वापस दिलाने में कामयाब होंगे। संघ की पहल पर कथाकार डॉ. काशीनाथ सिंह, आलोचक प्रो. चौथीराम यादव, जवाहर लाल कौल, प्रो. शाहिना रिजवी, जनकवि शिव कुमार पराग, प्रो. संजय कुमार, प्रो. श्री प्रकाश शुक्ल,प्रो.आशीष त्रिपाठी, डा.संजय श्रीवास्तव, प्रो.अनुराग कुमार, प्रो.निरंजन सहाय, प्रो.प्रभाकर सिंह, प्रो.नीरज खरे, डॉ.गोरख नाथ पाण्डेय, डॉ.वन्दना चौबे, डॉ.शिवानी, डॉ.नृपेंद्र नारायण सिंह, राजीव कुंवर ने अपना समर्थन दिया है।
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