वाराणसी में सोमवार को बीएचयू के वैदिक विज्ञान केन्द्र के सभागार में अन्तंराष्ट्रीय सम्मेलन में
बीएचयू में महाकाल द मास्ट ऑफ टाइम विषय पर संगोष्ठी-पूर्व कार्यशाला हुई। सोमवार को वैदिक विज्ञान केंद्र के सभागार में विद्वानों ने कहा कि महाकाल के साथ ही काल की गणना शुरू हुई। बीएचयू के पूर्व संकाय प्रमुख प्रो. रामचंद्र पांडेय ने कहा कि उज्जैन में काल गणना के सौर मंडलीय तत्व जुड़ते हैं। महाकाल की स्थापना के बाद से ही वहां की काल गणना के पौराणिक आधार मिलते हैं। सूर्य काल का नियामक है और इसकी इकाइयों का निर्धारण करता है।
काल गणना को शास्त्र और विज्ञान दोनों की संयुक्त सहायता से समझा जा सकता है, क्योंकि इसका मूल आधार वेद और वेदांगों में मिलता है। उज्जैन में तीन से पांच अप्रैल तक इसी विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी होगी। मध्य प्रदेश काउंसिल ऑफ साइंस एंड टेक्नॉलाजी, भारतीय ज्ञान परंपरा प्रभाग और विज्ञान भारती की ओर से ये कराया जाएगा। इसके प्रसार के लिए बीएचयू में सोमवार को कार्यशाला हुई।
वैज्ञानिक आधार पर स्थापित होंगी वैदिक पद्धतियां
मुख्य अतिथि और विज्ञान भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री डॉ. शिव कुमार शर्मा ने कहा कि काल का विशिष्ट स्वरूप महाकाल की नगरी उज्जयिनी में दिखता है। इसके अध्ययन से भारत का वैभव वापस आएगा। समय मापने की प्रक्रिया अनादिकाल से चली आ रही है। इसकी वैदिक पद्धति को वैज्ञानिक आधार पर स्थापित करना जरूरी है जिससे भारतीय काल गणना को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया जा सके।
मुहूर्त की गणना भी इसी आधार पर
कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि बीएचयू की यह कार्यशाला उज्जैन के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के लिए आधारशिला बनेगी। वैदिक काल गणना की जानकारी सभी को होनी ही चाहिए और जनसामान्य में जानकारी की उत्सुकता भी होनी चाहिए। यह वैदिक काल गणना आधुनिक विज्ञान पर आधारित काल गणना को नई दिशा देगा। हमारे ज्योतिष शास्त्र में जितने भी मुहूर्त की गणना होती है वह वैदिक काल गणना पर आधारित होती है।