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सात समंदर पार तक पहुंचाया संस्कृत का प्रकाश, खोली सरल संस्कृत की राह

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पद्मश्री से सम्मानित महामहोपाध्याय डॉ. भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी वागीश शास्त्री ने सात समंदर पार तक संस्कृत के प्रकाश को पहुंचाया। संस्कृत सीखने की सरल पद्धति के कारण देश-विदेश तक उनके शिष्यों की लंबी शृंखला है। उन्होंने बिना रटे संस्कृत सीखने की वाग्योग निमॉनिक संस्कृत का आविष्कार किया था। इसके जरिये कोई भी व्यक्ति बिना रटे 180 घंटे में संस्कृत व्याकरण का संपूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सकता है।
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श्री काशी विद्वत कर्मकांड परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने बताया कि डॉ. वागीश शास्त्री का जन्म 24 जुलाई 1934 को मध्यप्रदेश के सागर मंडल के बिलइया गांव में हुआ था। वृंदावन में अध्ययन के बाद 1954 में वह बनारस आए थे। पं. शुकदेव झा एवं रघुनाथ शर्मा से पाणिनीय नव्य व्याकरण, दर्शन, साहित्य और वेदांत में निपुणता प्राप्त की। पं. ढुंढिराज शास्त्री से न्याय और सांख्य शास्त्र का ज्ञान हासिल किया। 1959 में टीकमाणी संस्कृत महाविद्यालय में संस्कृत प्राध्यापक के रूप में अध्यापन आरंभ किया। इसके बाद संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में अनुसंधान संस्थान के निदेशक और प्रोफेसर पद पर नियुक्त हुए। विश्वविद्यालय में 27 सालों की सेवा के दौरान उन्होंने दो सौ दुर्लभ पांडुलिपियिों का संपादन, प्रकाशन और संस्कृत की शोध पत्रिका सारस्वती सुषमा का संपादन किया।
70 से अधिक देशों में हैं शिष्य
डॉ. वागीश शास्त्री की वाग्योग कुंडलिनी मेडिटेशन और वाग्योग निमॉनिक संस्कृत विश्व में बेहद लोकप्रिय हैं। इन दोनों विधियों की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 70 देशों में डॉ. शास्त्री के शिष्यों की लंबी शृंखला है।
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संस्कृत जगत के लिए अपूरणीय क्षति
महामहोपाध्याय डॉ. भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी के निधन पर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. हरेराम त्रिपाठी ने शोक जताया। प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि यह संस्कृत जगत और संस्कृत विश्वविद्यालय की अपूरणीय क्षति है। इस रिक्तता को भरना कठिन होगा।
2013 में मिला था राष्ट्रपति पुरस्कार
डा. शास्त्री को 2018 में पद्मश्री और वर्ष 2013 में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा राजस्थान संस्कृत अकादमी की ओर से उन्हें बाणभट्ट पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। आचार्य वागीश शास्त्री को 1982 में ही काशी पंडित परिषद की ओर से महामहोपाध्याय की उपाधि दी गई थी।
पॉप गायिका मैडोना को भी सिखाया सही उच्चारण
आशापति शास्त्री ने बताया कि पिताजी ने मैडोना ने जब योग तारावली का गायन किया था तो उनके गायन में कई अशुद्धियां थीं। इसके बाद पिताजी ने मैडोना को सही उच्चारण करना सिखाया था।
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पुरस्कार
कालिदास पुरस्कार, सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार, उत्तर प्रदेश, 1966-67
उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी, 1968, 1971, 1981, 1985, 1995, 1996 द्वारा 6 बार सम्मानित।
वेद-वेदांग पुरस्कार, राजस्थान संस्कृत अकादमी, 1994
अनुसंधान पुरस्कार (अनुसंधान पुरस्कार), उत्कल पति ट्रस्ट, 1995
स्वामी विष्णु तीर्थ सम्मान (आध्यात्मिक लेखन पुरस्कार), इंदौर, 2002
विशेष पुरस्कार, सरकार। उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान, 2005।
सौहार्द सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ, 2014
यश भारती सम्मान, 2015
विश्व भारती सम्मान, संस्कृत कार्य में सर्वोच्च सम्मान, यूपी संस्कृत संस्थान द्वारा, लखनऊ, 2013
महाकवि कालिदास संस्कृत व्रत सम्मान-2016
बुंदेली साहित्य परिषद, भोपाल द्वारा राष्ट्रीय छत्रसाल सम्मान-2017।
संस्कृत साधना सम्मान महर्षि वेदव्यास सम्मान 2017, दिल्ली संस्कृत अकादमी, नई दिल्ली द्वारा।
मानद डी. लिट। 2018, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय
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