महाभारत काल के बाद पहली बार किन्नरों ने किया श्राद्ध
विमल तीर्थ के रूप में विख्यात पिशाच मोचन कुंड पर किन्नरों ने पहली बार अपने पुरखों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान किया। उज्जैन के किन्नर अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने कई अखाड़े के मंडलेश्वरों के साथ पिंडदान किया। कुंड पर त्रिपिंडी श्राद्ध किया गया ताकि उनके ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों की भटकती आत्मा को मुक्ति मिल सके। पहली बार महाभारत काल में शिखंडी ने अपने पूर्वजों की स्मृति में पिंडदान किया था।
पिशाच मोचन कुंड पर दिन के करीब 11 बजे वेदियों पर तीन-तीन कलश क्रमश: लाल, काले और सफेद कपड़ों में अभिमंत्रित कर सस्वर मंत्रोच्चार के साथ श्राद्ध आरंभ हुआ। इस दौरान जोरदार बारिश होने लगी। तीर्थ पुरोहितों ने श्राद्ध के समय बारिश को शुभ बताया। उनका कहना था कि किन्नरों के पुरखों की आत्माओं के तृप्त होने का यह शुभ संकेत है।
पिंडदान करने वालों में मंडलेश्वर देवी भवानी, मंडलेश्वर देवी पवित्रा, दिल्ली से आईं मंडलेश्वर देवी खुशी सिंह, लखनऊ की देवी सुधा तिवारी, देवी पिंकल, देवी प्रेमी, कमल, देवी मुजरा समेत कुल 14 किन्नर शामिल हुए। आचार्य अनूप शर्मा के आचार्यत्व में 21 पुरोहितों ने पिंडदान कराया। श्राद्ध प्रधान तीर्थपुरोहित नेपाली लाल मोहरिया पंडा पं. रविशंकर द्विवेदी और मुन्ना लाल पांडेय के निर्देशन में हुआ।
इस मौके पर किन्नर अखाड़े के संस्थापक ऋषि अजय दास, गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री जितेंद्रानंद सरस्वती, अखिल भारतीय दंडी संन्यासी महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बिमल देव आश्रम, तारिणी न्यास मंत्री मयंक कुमार उपस्थित थे।