शंकुल धारा पोखरा स्थित द्वारिकाधीश मंदिर में 51 दिवसीय लक्षचंडी महायज्ञ के तीसरे दिन अरणि मंथन से यज्ञ की अग्नि प्रज्ज्वलित हुई। महायज्ञ में गणपति पूजन एवं दुर्गासप्तशती पाठ का आयोजन हुआ। बृहस्पतिवार को प्रात: लक्ष्मीकांत दीक्षित के आचार्यत्व में आचार्य सुनील दीक्षित, अरुण दीक्षित सहित 21 आचार्य की देखरेख में मुख्य यजमान तिलकराज शर्मा व आरती शर्मा ने गणपति पूजन किया।
दुर्गा सप्तशती पूजन के साथ ही यज्ञशाला में स्थापित देवताओं एवं सर्वतोभद्र, पंचांगपीठ का पूजन हुआ। वैदिक विधि विधान एवं परंपरागत रूप से अरणि मंथन से यज्ञ के लिए अग्नि की स्थापना हुई। महामंडलेश्वर स्वामी प्रखर महाराज ने बताया कि यज्ञ का शुभारंभ करने के लिए अरणि मंथन से उत्पन्न अग्नि ही सर्वश्रेष्ठ है। यज्ञ में आहुति के लिए अग्नि की आवश्यकता होती है। अग्नि व्यापक है लेकिन यज्ञ के निमित्त उसे प्रकट करने के लिए भारत मे वैदिक परंपरा के अनुसार अरणि मंथन किया जाता है। स्वामी पूर्णानंदपुरी महाराज ने यज्ञशाला की परिक्रमा की। स्वामी पूर्णानंदपुरी ने बताया कि लक्षचंडी यज्ञ के दौरान उत्पन्न ऊर्जा व्यापक एवं अत्यंत प्रभावशाली होगी। यज्ञ प्रारंभ के साथ-साथ देर शाम को गंगा की महाआरती भी आयोजित हुई। इस दौरान आचार्य गौरव शास्त्री,आत्मबोध प्रकाश, मां चिदानंदमयी, कृष्ण कुमार खेमका, संजय अग्रवाल, राजेश अग्रवाल, कोषाध्यक्ष सुनील नेमानी, आत्मबोध प्रकाश, आचार्य गौरव शास्त्री उपस्थित रहे।