फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सारनाथ में गूंजा धम्मचक्र प्रवर्तन सूत्र, महाकारुणिक थे भगवान बुद्ध, बौद्ध धर्म के लिए है बहुत पवित्र दिन

Sun, 05 Jul 2020 12:37 AM IST
गीतार्जुन गौतम अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
विज्ञापन
आषाढ पूर्णिमा के अवसर पर विशेष पूजन अर्चन करते मूल गंध कुटी बौद्ध मंदिर में बौद्ध भिक्षु । - फोटो : अमर उजाला।
विज्ञापन

भगवान बुद्ध के जीवन की सभी घटनाएं पूर्णिमा से ही जुड़ी हुई हैं। जन्म, ज्ञान प्राप्ति, धर्म उपदेश और महापरिनिर्वाण। कोरोना संक्रमण के कारण आषाढ़ी पूर्णिमा पर तथागत की उपदेश स्थली पर सादगीपूर्वक पूजन आरंभ हुआ। शनिवार को मूलगंध कुटी बौद्ध मंदिर में सुबह 7 बजे से ही पूजा-पाठ आरंभ हो गया।

विज्ञापन

 
बिहाराधिपति डॉ. के मेधांकर थेरो की अगुवाई में भिक्षु जिनानंद, भिक्षु हेमरतन, भिक्षु कोलित, भंते मैत्री के साथ मंदिर प्रांगण के गर्भ गृह में विश्वकल्याण के लिए थेरवाद परंपरा के अनुसार धम्मचक प्रवर्तन सूत्र का पाठ हुआ। उसके उपरांत भगवान बुद्ध की ज्ञान मुद्रा में स्थापित मूर्ति के समक्ष खीरदान हुआ। 

सारनाथ स्थित जापानी मंदिर, तिब्बतन बौद्ध मंदिर, थाई मंदिर, वियतनामी मंदिर, कंबोडिया टेंपल सहित सभी मठ-मंदिरों में पूजा पाठ हुआ। आषाढ़ पूर्णिमा की पूर्व सांध्य पर शनिवार को बौद्ध मठों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदेश को बौद्ध भिक्षुओं ने सुना।

सारनाथ स्थित धम्म शिक्षण केंद्र के संस्थापक भिक्षु चंदिमा ने कहा कि आषाढ़ पूर्णिमा के अवसर पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसके माध्यम से भगवान बुद्ध के विचार को दुनिया में फैलाया गया।
विज्ञापन

धम्म चक्र प्रवर्तन दिवस पर मिला था पांच शिष्यों को ज्ञान

बिहाराधिपति डॉ. के मेधांकर थेरो ने बताया कि भगवान बुद्ध महाकारुणिक थे और करुणा से ओत प्रोत होकर उन्होंने निर्णय लिया कि सबसे पहले मुझे अपने पुराने साथियों को उपदेश देना है। इसके बाद वह बोधगया से निकल कर सारनाथ के ऋषिपतन मृगदाय वन में पहुंचे जहां उनके पांच पुराने साथी थे। जिन्होंने लगभग छह वर्षों तक उनके साथ कठोर तप किया था और उस दौरान बोधिसत्व सिद्धार्थ गौतम की सेवा करते थे। 

हालांकि तथागत बुद्ध उन पांचों को नहीं भूले थे। वैसाख पूर्णिमा को ज्ञान प्राप्ति के बाद और निर्वाण सुख पूरा करने के बाद 11 दिनों में लगातार पैदल चल कर वह वाराणसी के ऋ षिपतन मृगदाय वन में पहुंचे। अपने पुराने पांचों साथियों को धम्म उपदेश दिया। तथागत बुद्ध का उपदेश प्राप्त करने के बाद वो पांचों शिष्य अर्हत हो गए। वहीं ऋषिपतन मृगदाय वन में वह बुद्ध की सेवा करने लगे। इसी वन में तथागत बुद्ध ने अपने पांचों शिष्यों के साथ अपना पहला वर्षावास किया। 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें