कृति, विकृति और आकृति में है, इस संसार का स्वरूप क्योंकि त्रिगुणात्मक सृष्टि के क्रमिक विकास में जो सहायक है किसी भी रूप में वह शिव का ही अंग है। इसलिए पंचभूतों का आधार लिया जाता है जो जगत के पंच तत्व के लिए एक कार्ययोजना बनाने में मदद करता है। जहां तक सवाल है संसाधनों के निर्माण का तो उस में निहित साधन ही स्वतः स्फूर्त होकर जागृत हो जाते हैं। शिव सूत्र में समाहित संस्कृति ही प्रकृति की आधारशिला है।
ये बातें भगवान वेदांताचार्य रसिक ने कहीं। वह रविवार को फलाहारी बाबा आश्रम की ओर से शिवपुर के रामलीला मैदान में चल रहे महालक्ष्मी महायज्ञ के अवसर पर आयोजित शिवमहापुराण की कथा के तीसरे दिन प्रवचन दे रहे थे। उन्होंने शिव महापुराण की कथा में हरिहरात्मक भक्ति का सूत्रधार बताते हुए कहा कि माहेश्वर सूत्रों में विज्ञान की धारा मूर्त रूप से विद्यमान है। क्योंकि, धर्म एक सजग प्रहरी है अन्य चारों पुरुषार्थों की रक्षा करने में वह सक्षम है इसलिए सृष्टि की रक्षा करने में भी शिव का योगदान है, जिससे प्रकृति पुष्पित और पल्लवित होती है। इस दौरान राम करण दास त्यागी, राम दास त्यागी, विनोद कुमार दुबे, कमलेश केशरी, डाॅ. अजय मिश्रा, पुरुषोत्तम जालान मौजूद रहे।