कलश स्थापना के साथ ही शक्ति की आराधना का महापर्व नवरात्र की शुरुआत हो गई है। एक तरफ मंदिरों में देवी का दरबार सजा तो घरों में भक्तों ने माता का आह्वान किया। दुर्गा सप्तशती के मंत्रों के साथ कलश स्थापना हुई और नौ दिवसीय अनुष्ठान का उल्लास छा गया।
सुबह से ही दुर्गा मंदिरों में भीड़-भाड़ रही। शैलपुत्री से लेकर कूष्मांडा, कामाख्या से लेकर महागौरी, महालक्ष्मी से लगायत महाकाली के मंदिरों की गलियों में माता के जयकारे गूंज रहे थे। आठ दिवसीय नवरात्र के पहले दिन पारंपरिक अनुष्ठान की शुरुआत ब्राह्मणों ने माता का आह्वान किया। कोरोना काल में भक्त माता से विश्व को कोरोना से मुक्त करने की कामना कर रहे हैं।
सुहागिनों ने की सौभाग्य की कामना की
बृहस्पतिवार को अलईपुर स्थित मां शैलपुत्री का दरबार भक्तों की जय-जयकार से गूंज उठा। मंगला आरती के बाद दर्शन पूजन का सिलसिला शुरू हुआ जो देर रात तक अनवरत जारी रहा। सुहागिन महिलाओं ने माता को सुहाग केसामान अर्पित कर सौभाग्य की कामना की।
पंडालों में विराजी मां दुर्गा, छह जगहों पर स्थापित हुई प्रतिमाएं
बृहस्पतिवार को मैदागिन स्थित सार्वजनिक दुर्गा समिति टाउनहाल में माता की रजत प्रतिमा और कलश स्थापित कर पूजन आरंभ हुआ। यजमान संजय मिश्रा व पूजा मिश्रा रहे। आचार्य राजू दुबे ने प्रतिमा स्थापित कराई। केंद्रीय पूजा समिति के अध्यक्ष तिलक राज मिश्रा ने बताया कि मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित हो गई है। टाउनहाल में नौ दिनों तक देवी भागवत की कथा का रसपान नौ दिनों तक होगा। पहले दिन पं रामसूरत द्विवेदी और आचार्य जनार्दन कृष्ण ने कथावाचन किया। शारदा विद्या मंदिर गायघाट में शारदीय दुर्गा पूजनोत्सव की ओर से मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की गई। पं. शिवकुमार त्रिपाठी ने मंत्रोच्चार के साथ विधि-विधान पूर्ण किए। कलश पूजन, कुंवारी पूजन के बाद दुर्गा सप्तशती का पाठ हुआ। इस दौरान श्यामसुंदर अग्रवाल, रमाशंकर त्रिपाठी, रतन जैतली, विकास चौधरी, उमेशचंद्र अग्रवाल, संजय मानसिंका, अभिषेक व डॉ. श्याम प्रताप सिंह मौजूद रहे। केंद्रीय पूजा समिति के अध्यक्ष तिलकराज मिश्र ने बताया कि शहर में नवापुरा मां दुर्गापूजा समिति, दुर्गा पूजा समिति दारानगर, एसबी दुर्गोत्सव समिति सुड़िया और जोगेश्वर महादेव बड़ा गणेश में माता की छोटी प्रतिमाएं स्थापित हुईं और पूजन आरंभ हो गया।
आज होगा मां ब्रह्मचारिणी का दर्शन
शारदीय नवरात्र के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी के दर्शन का विधान है। बनारस में मां ब्रह्मचारिणी का मंदिर बालाजी घाट पर स्थित है। मान्यता है कि माता के दर्शन से संतान की प्राप्ति होती है और माता धन-धान्य से परिपूर्ण करती हैं। मां ब्रह्मचारिणी हमेशा शांत और संसार के सुख-दुख से विरक्त होकर तपस्या में लीन रहती हैं। कठोर तपस्या के कारण इनके चेहरे पर अद्भुत तेज और आभामंडल विद्यमान है। मां के एक हाथ में माला तो दूसरे हाथ में कमंडल होता है।
देवी पूजन से होगा विश्वकल्याण और राष्ट्र का उत्थान
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में नवरात्रि की प्रतिपदा को मां वाग्देवी और मां दुर्गा का पूजन हुआ। कुलपति प्रो. हरेरराम त्रिपाठी ने पूजन के बाद बताया कि आज प्रथम दिन मां शैल पुत्री रुप का पूजन किया जाता है। इसमें राष्ट्रउत्थान, विश्वकल्याण एवं संस्कृत के उत्थान के लिये पूजन किया जा रहा है। पूजन को पुजारी डॉ सच्चिदानंद ने संपन्न कराया।
बंगाल ने ही रोपा मिनी बंगाल में दुर्गोत्सव का बीज
काशी में दुर्गोत्सव का आरंभ 271 साल पुराना है। चौखंभा मोहल्ले के मित्रा परिवार के प्रांगण में हुई उत्सव की शुरुआत आज संपूर्ण काशी का हिस्सा बन चुकी है। यह एकमात्र ऐसा सार्वजनिक पूजन स्थल है जहां मां दुर्गा, गणेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी और सरस्वती के साथ ही भगवान श्रीराम की प्रतिमा भी स्थापित करने की परंपरा है। वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य ने बताया कि बंगाली ड्योढ़ी में देवी प्रतिमा को चांदी के सिंहासन पर विराजमान कराया जाता है। यह सिंहासन 18वीं सदी में फ्र ांस के कारीगरों ने बनाया था। पुराने दौर में इस सिंहासन पर स्थापित होने वाली दुर्गा प्रतिमा पर सोने का पत्तर चढ़ाया जाता था। वर्तमान में उस परंपरा के प्रतीक स्वरूप प्रतिमा को सुनहरे और रुपहले रंगों से रंगा जाता है। पंडित मदन मोहन मालवीय और एनी बेसेंट ने बीएचयू की स्थापना की रणनीति इसी हवेली में बैठकर बनाई थी। पश्चिम बंगाल के राजा गोविंद राम मित्रा के प्रपौत्र राजा आनंद मित्रा 1750 में काशी आए। उन्होंने भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र के आवास के निकट ही विशाल हवेली बनवाई जो बंगाली ड्योढ़ी के नाम से प्रसिद्ध हुई। उन्होंने काशी आगमन के साथ ही शारदीय नवरात्र में देवी दुर्गा की प्रतिमा स्थापना कर बंगाल की मातृतांत्रिक परंपरा की नींव काशी में डाली।