अमावस की रात साधकों, तांत्रिकों और अघोरियों के लिए खास रही। कालरात्रि में सुख, समृद्धि और ऐश्वर्य के साथ जगत के कल्याण की सिद्धियां जागृत की गईं। महानिशा काल में मणिकर्णिका महाश्मशान के अलावा हरिश्चंद्र घाट के श्मशान पर तंत्र सिद्धि के लिए विशेष पूजा की गई। महानिशा पूजन अर्धरात्रि के बाद रात 1:33 बजे से आरंभ हुआ। महानिशा पूजा के लिए विदेशी संत भी काशी पहुंचे।
वर्ष की चार रात्रियों में से एक कालरात्रि में गुरुवार की रात महानिशा पूजा साधकों ने सविधि तंत्र क्रियाओं के साथ की। श्मशान घाटों पर अघोरियों, साधकों ने अर्धरात्रि के बाद आसन लगाए। सात्विक, राजसी और तामसी विधियों से बलि भी दी गई।
कामरूप कामाख्या के अलावा देश के अन्य इलाकों से आए अघोरियों ने भस्म-भभूत पोत कर श्मशान घाटों पर तंत्र साधना की। उग्र चंडेश्वर महाश्मशान पीठाधीश्वर कपाली बाबा ने हरिश्चंद्र महाश्मशान पर महानिशा में विशेष पूजा की।
उनके साथ अन्य अघोरियों ने भी तंत्र पूजा में हिस्सा लिया। मणिकर्णिका घाट पर भी साधकों ने सिद्धियों को भोर 3:37 बजे तक जागृत किया। माना जाता है कि इस रात महानिशा में तंत्र-मंत्र सिद्ध हो जाते हैं। इस पूजा के कई विदेशी संत भी प्रत्यक्षदर्शी बने। ताराबाड़ी के मां तारा मंदिर, देवनाथपुरा के शव शिवा काली मंदिर के अलावा अन्य मंदिरों में महानिशा पूजन हुआ।