वाराणसी। चातुर्मास की साधना से अर्जित ऊर्जा एवं शक्ति का प्रयोग सभी संन्यासियों को राष्ट्रहित में करना चाहिए। इसके लिए संन्यासी देश में प्रवास कर जागरण करें। यदि सनातन धर्म कमजोर हुआ तो देश कमजोर होगा। जहां-जहां सनातन धर्मावलंबियों की संख्या कम हुई वहां देश विरोधी गतिविधियां बढ़ गईं। इसलिए सनातन धर्म के बिना भारत की कल्पना नहीं की जा सकती है। उक्त बातें स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती ने कहीं। वह रविवार को चातुर्मास के समापन पर श्री काशी सुमेरूपीठ में गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। गोष्ठी के पश्चात भंडारे का आयोजन किया गया।
उन्होंने कहा कि सनातन धर्मावलंबियों के अपने धर्म के प्रति उदासीन होने के कारण ही पूरे देश में तथाकथित विकास के नाम पर धर्मस्थलों का ध्वंस किया जा रहा है। यह किसी भी स्थिति में सहन करने योग्य नहीं है। जगन्नाथपुरी से आए स्वामी अरूपानंद गिरि ने विकास के नाम पर जगन्नाथपुरी के प्राचीन मंदिरों को तोड़े जाने की कार्यवाही की निंदा की। उन्होंने आह्वान किया कि इस कुकृत्य के खिलाफ सनातनियों को जागृत कर व्यापक आंदोलन के लिए तैयार करें। स्वामी बृजभूषण दास महाराज, स्वामी अखंडानंद तीर्थ महाराज, स्वामी प्रकाश आश्रम, स्वामी राजेश आश्रम ने भी विचार व्यक्त किए।