वाराणसी। काशी लेखन मंच (कलम) की मासिक गोष्ठी में वरिष्ठ कवयित्री एवं कथाकार डॉ. मुक्ता ने कहा कि आज के कठिन दौर में कविता से ही उम्मीद बची है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का स्मरण करते हुए उन्होंने ‘काशी लेखन मंच’ (कलम) को कविता का एक स्कूल बताया, जहां नवोदित और वरिष्ठ दोनों तरह के कवियों की गंभीर कविताओं को सुनने का अवसर मिलता है और यहां हर प्रतिनिधि काव्य रूप की उपस्थिति भी मिलती है।
उन्होंने अपनी दो महत्वपूर्ण कविताओं का पाठ किया। अल्मोड़ा से आईं और महाकवि सुमित्रानंदन पंत की नातिन लावण्या जोशी ने पंत जी के साथ के अपने अनेक संस्मरण सुनाए और काशी से जुड़ी अपनी कई कविताओं ‘ओ बारिश’, ‘नदी’ और ‘प्रतीक्षारत’ का पाठ किया। सारस्वत अतिथि प्रो. मंजुला चतुर्वेदी ने ‘अमन के मसीहा का दमन चक्र जारी है’ रचना के माध्यम से समकालीन राजनीति के छद्म को उजागर किया। मुख्य अतिथि और वरिष्ठ कवि-आलोचक डॉ. अशोक सिंह ने अपने कुछ मुक्तक और एक समकालीन गीत ‘किस गांव-नगर से आते हैं, जो लोग अभी भी गाते हैं’ का पाठ किया। वरिष्ठ गीतकार सूर्य प्रकाश मिश्र ने ‘बहुत जिए गीतों के जैसे, आओ मुक्त छंद हो जाएं’ गीत के माध्यम से कविता में लयधर्मिता को जरूरी बताया। वरिष्ठ कवयित्री डॉ. मंजरी पांडेय ने ‘हम तो खुशबू घोल रहे हैं, वो फूलों को तोल रहे हैं’ गजल प्रस्तुत की। चर्चित कवयित्री डॉ. सविता सौरभ ने दो समसामयिक गीत-गजलों ‘हर तरफ खामोशियां हैं, होंठ पर छाले पड़े’ और ‘रहे पलक न कोई नम, ये फैसला कर लें’ का प्रभावी पाठ किया। युवा व्यंग्य कवि नवल किशोर गुप्त ने अपनी दो प्रभावी कविताओं का पाठ किया। वरिष्ठ कवि केशव शरण ने कम शब्दों में समकालीन गजल का ताप प्रकट किया।