बलिया। निराशा, कुंठा और अवसाद के चलते आत्महत्या की घटनाएं बढ़ी हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो एक जून से अब तक 10 लोगों ने आत्महत्या की। आत्महत्या की प्रवृति मनोवैज्ञानिक ही नहीं बल्कि सामाजिक मुद्दा है। आत्महत्या का अर्थ है स्वयं को इस प्रकार क्षति पहुंचाना, जिससे मृत्यु हो जाय। पुनर्वास मनोवैज्ञानिक पूजा भट्ट की मानें तो आत्महत्या कभी अचानक नहीं होती।
इसकी प्लानिंग व्यक्ति सालों व महीनों से कर रहा होता है। यह प्रवृति महिलाओं से ज्यादा पुरुषों में पाई जाती है। वर्तमान में भाग दौड़ के जीवन में प्रतिस्पर्धा की होड़, करियर, पढ़ाई एवं अल्प समय में सब कुछ पाने की चाहत आदि मुख्य है। इसके अलावा अकेलापन, ब्रेकअप आदि के कारण युवाओं का डिप्रेशन में जाना, परिवार में सामंजस्य की कमी, भावनात्मक सहारा न मिलना, विवाह विच्छेद, असाध्य रोग, अवांछित घटनाएं, एक तरफा प्यार, नाकारात्मक विचार व भय आदि कारण होते है।
बताया कि इसमें मेंटल इलनेेश 95 फीसदी, डिप्रेेशन 80 फीसदी, स्किनजोफेनिया 10 फीसदी एवं एल्कोहल 25 फीसदी मुख्य कारण है। इसके साथ ही अकेलापन में स्मार्टफोन का उपयोग, जिसमें युवा वर्ग रियल वर्ल्ड से ज्यादा वर्चुअल वर्ल्ड में ज्यादा समय गुजारते हैं।