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Sports: काशी का बेनिया कहलाता है फुटबॉल का मक्का, यहां एक ही घर से निकले हैं 11 राष्ट्रीय खिलाड़ी

Thu, 29 Jan 2026 01:55 PM IST
प्रगति चंद नीलांबुज तिवारी, संवाद न्यूज एजेंसी, वाराणसी।

सार

Varanasi News: वाराणसी जिले के बेनियाबाग और आसपास के क्षेत्रों में कई घर ऐसे हैं जिसमें लोग दो-तीन पीढ़ी से फुटबॉल खेल रहे हैं। इस क्षेत्र में हर एक घर में फुटबॉल खिलाड़ी हैं। 
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बेनिया के फुटबॉल खिलाड़ी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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वाराणसी के बेनियाबाग को फुटबॉल का मक्का कहा जाता है। यहां आसपास के क्षेत्र में हर एक घर में फुटबॉल खिलाड़ी हैं। यहां कई घर तो ऐसे भी हैं जिसमें लोग दो-तीन पीढ़ी से फुटबॉल खेल रहे हैं। दालमंडी क्षेत्र में एक ही घर के जुड़वा भाई समेत कुल 11 से ज्यादा खिलाड़ी राष्ट्रीय फुटबॉलर हैं। इनमें छह खिलाड़ी फुटबॉल के दम पर अलग-अलग राज्यों में नौकरी कर रहे हैं। 

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अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल खिलाड़ी शम्सी रजा बताते हैं कि उनके पिता रजा अली बेनिया मैदान के फुटबॉलर थे। उनको देखकर ही खेलना शुरू किया और अब वह खुद फुटबॉल कोच हैं जबकि उनके जुड़वा भाई शरियत रजा और फरहत रजा फुटबॉल खेलकर ही ही राज्य और केंद्र में नौकरी कर रहे हैं। 

घर के ही शादाब रजा, मीशम रजा फुटबॉल के राष्ट्रीय खिलाड़ी रहे हैं और वर्तमान में सरकारी नौकरी कर रहे हैं। दालमंडी निवासी अनीस हसन ने भी सब जूनियर नेशनल 1989 खेला था। उनके पुत्र यासुब हसन अभी मुंबई में पढ़ाई के साथ फुटबॉल खेलते हैं। 

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यासुब भी वाराणसी से कई नेशनल खेल चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी नूर आलम भी भारत का कई मंच पर प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। फिलहाल उनके बेटे हसन आलम स्पेनिश बी डीवीजन क्लब से फुटबॉल खेलते हैं। हालांकि, इतने खिलाड़ी निकलने के बाद भी यहां सबको बेनिया मैदान के छोटे होने का मलाल है। खिलाड़ियों ने कहा कि बनारस में एक अच्छे मैदान की जरूरत है।  
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शम्सी रजा ने पेशावर में पाकिस्तान के खिलाफ किया था गोल

फुटबॉल कोच शम्सी रजा प्री-ओलंपिक खेल चुके हैं। उन्होंने बताया कि अक्तूबर 1995 में पाकिस्तान के खिलाफ पेशावर में न सिर्फ मैच खेला था बल्कि स्कोर करने में कामयाब हुए थे। इनके अलावा एक गोल स्टार फुटबॉलर वाइचुंग भुटिया ने किया था। यह मैच भारत ने 2-1 से जीता था। शम्सी ने बताया कि पहले यह मैच लाहौर में होना था लेेकिन बाद में पेशावर में हुआ। तनाव के बीच उस मैच में दर्शक नहीं थे पूरे मैदान में केवल पुलिस और कमांडो तैनात थे। इसके बावजूद हमारे अंदर जीत का जुनून था।

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पुलिस के साफे से बनावाई थी शर्ट
नूर आलम ने बताया कि गुलामी के दौर में अंग्रेजी हुकूमत के आला अधिकारी ने खिलाड़ियों को बिना टीशर्ट के फुटबॉल खेलते देखा। इस पर अंग्रेज अफसर ने पुलिस लाइन से सिपाहियों के सिर पर बांधे जाने वाले लाल रंग के साफे से 30 खिलाड़ियों के लिए लाल रंग की शर्ट बनवाई थी। आज भी बेनिया के खिलाड़ी वही लाल रंग की जर्सी पहनकर फुटबॉल खेलते हैं।
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