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Success Story: टूटी चप्पल से मैदान में उतरीं गुंजन, फिटनेस ट्रेनर बनकर बदली जिंदगी; पढ़ें- संघर्ष की कहानी

Sat, 27 Sep 2025 03:46 PM IST
प्रगति चंद अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi Crime News: काशी की गुंजन प्रजापति की कहानी संघर्ष से सफलता तक के सफर की मिसाल है। टूटी चप्पल से मैदान में उतरीं और फिटनेस ट्रेनर बनकर उनकी जिंदगी बदल गई।
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फुटबॉल खिलाड़ी गुंजन प्रजापति - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बनारस के नाथूपुर गांव की रहने वाली गुंजन प्रजापति की कहानी संघर्ष से सफलता तक के सफर की मिसाल है। कभी राष्ट्रीय स्तर की फुटबॉल खिलाड़ी रही गुंजन ने हालात के आगे घुटने टेकने के बजाय फिटनेस ट्रेनिंग को अपना कॅरिअर बनाया और अपने परिवार को नया संबल दिया।

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गुंजन का बचपन संघर्षों से भरा रहा। वर्ष 2003 में पिता का निधन हो गया था, तब वह बहुत छोटी थीं। मां कुमकुम देवी ने मिट्टी के बर्तन बनाकर बच्चों का पालन-पोषण किया। रहने को पक्का घर भी नहीं था, परिवार लकड़ी और मिट्टी की झोपड़ी में गुजारा करता था। दो वक्त की रोटी जुटाना भी एक चुनौती थी। ऐसे कठिन माहौल में गुंजन ने अपना बचपन बिताया और मां के साथ बर्तन बनाने में हाथ बंटाया।

गुंजन ने वर्ष 2012 में, कक्षा 8 में पढ़ते हुए, फुटबॉल खेलना शुरू किया। उन्हें पता चला कि बनारस रेल इंजन कारखाना में निशुल्क प्रशिक्षण दिया जाता है। फटे कपड़े और टूटी चप्पल पहनकर मैदान में उतरीं गुंजन ने मेहनत और लगन से अपनी जगह बनाई। उनके कोच भैरव दत्त बताते हैं कि गुंजन हमेशा राइट स्टॉपर पोजीशन पर खेलती थीं और उन्होंने 18 राज्य स्तरीय मैचों में गोल्ड मेडल जीता। कुल मिलाकर उन्होंने 40 से ज्यादा मैचों में भाग लिया, जिनमें सात राष्ट्रीय स्तर के मुकाबले भी शामिल हैं।
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गुंजन का कॅरिअर तेजी से आगे बढ़ रहा था, लेकिन 2020 में आई कोरोना महामारी ने सब कुछ थाम दिया। लॉकडाउन में खेलकूद बंद हो गए, घर की आर्थिक स्थिति और बिगड़ गई, और उनकी एक बहन ब्रेन ट्यूमर जैसी गंभीर बीमारी से जूझने लगी। उस समय घर में सिर्फ बड़े भाई जिया लाल ही कमाने वाले थे, लेकिन उनकी आमदनी पूरे परिवार के लिए नाकाफी थी।

इन हालातों ने गुंजन को मजबूर किया कि वह फुटबॉल से दूरी बनाकर परिवार की ज़िम्मेदारी उठाएं। उन्होंने अपने सपनों को थोड़े समय के लिए किनारे रखकर फिटनेस ट्रेनिंग को कॅरिअर बनाने का फैसला किया। वर्ष 2020 में उन्होंने जिम में और लोगों के घर जाकर फिटनेस ट्रेनिंग देना शुरू किया। आज गुंजन न सिर्फ अपने परिवार का सहारा हैं, बल्कि बहन के इलाज का खर्च भी खुद उठा रही हैं। बीते पांच वर्षों में उन्होंने झोपड़ी से निकलकर दो मंजिला पक्का मकान खड़ा किया, जिसे वह अपना राजमहल मानती हैं।
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बहन नहीं, भाई का निभाया कर्तव्य
गुंजन के भाई जिया लाल कहते हैं, गुंजन बहन कम, भाई की तरह है। उसने हर ज़िम्मेदारी कंधे से कंधा मिलाकर निभाई है। हमें उस पर गर्व है। उनकी मां भी भावुक होकर कहती हैं, कभी सोचा भी नहीं था कि जिंदगी में इतना बड़ा बदलाव आएगा, लेकिन गुंजन ने मेहनत से सब कुछ बदल दिया। आज गुंजन फिटनेस ट्रेनिंग के साथ-साथ बीपीएड की तैयारी भी कर रही हैं। कोच भैरव दत्त का कहना है कि जल्द ही वह किसी अच्छे संस्थान में बच्चों को ट्रेनिंग देती नजर आएंगी।
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