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Mau News: 40 साल से बंद कताई मिल की छत व दीवार गिरने से दो बच्चों की मौत, 30 मिनट बाद निकाला जा सका शव

Sun, 11 May 2025 10:50 AM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, मऊ।

सार

Mau News: दीवार गिरने की सूचना पाकर माैके पर पहुंची पुलिस ने दबे किशोरों को बाहर निकलवाकर अस्पताल भिजवाया। हादसे के बाद मौके पर हड़कंप मच गया। 
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जेसीबी से मलबे को हटवाते लोग। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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40 साल से बंद बझौला स्थित सुबसा कताई मिल की छत और दीवार गिरने से रविवार को शिवम (10), निहाल (10) की मौत हो गई। मलबे में दबे बच्चों के शव मुश्किल से निकाले जा सके। फिर बुलडोजर से मिल का जर्जर भवन ध्वस्त करा दिया गया। इस हादसे में दो बच्चों की जान बची गई है। वह भी मिल परिसर में गए थे।

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हलधरपुर थाना क्षेत्र के बिलौझा स्थित कताई मिल परिसर में आम के पेड़ हैं। रविवार को चार बच्चे आम बीनने गए थे। इसी बीच बंद और जर्जर मिल भवन की छत का एक हिस्सा और दीवार गिर गई। इसके नीचे चारों दब गए। हादसे की सूचना मिलते ही एडीएम, एएसपी पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए।

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ये हुए हादसे के शिकार

एएसपी महेश सिंह अत्री ने बताया कि हादसे में बिलौझा निवासी शिवम (10) और निहाल (10) की मौत हुई है। शिवम और निहाल सहित चार बच्चे बकरी चराते हुए रतनपुरा-भीमपुरा मार्ग पर 40 साल से बंद सुबसा कताई मिल परिसर में आम बीनने गए थे। जर्जर भवन की की छत और दीवार ढहने से शिवम और निहाल मलबे के नीचे दब गए। सूचना मिलते ही हलधरपुर थाने की पुलिस तीन बुलडोजर के साथ मौके पर पहुंची और राहत-बचाव कार्य शुरू कराया। 

टीम ने सबसे पहले शिवम को मलबे से निकालपुर रतनपुरा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया, जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। निहाल को मलबे से निकालने में टीम को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। करीब तीस मिनट के बाद उसका शव बाहर निकाला जा सका। अरुण और लड्डू पर मलबे का ज्यादा हिस्सा नहीं गिरा था, इसलिए ग्रामीणों ने उन्हें जल्द ही बाहर निकाल लिया। इससे दोनों की जान बच गई।

बाल बाल बच गए अरुण और लड्डू

मृतक शिवम के पिता शिवशंकर ने बताया कि शिवम दो भाई और एक बहन में दूसरे नंबर का था। वहीं निहाल दो भाइयों में सबसे बड़ा था। उसका छोटा भाई अरुण भी आम बीनने के लिए मिल परिसर के अंदर गया था, लेकिन अरुण और उसके साथ गया लड्डू बाल बाल-बच गए। दोनों पर मलबा ज्यादा नहीं गिरा था। घटना के बाद गांव में सन्नाटा पसरा गया। गांव के लोगों ने बताया कि मिल के खंडहर में अक्सर बच्चे खेलते थे। लोग जानवरों को चराने के लिए जाते थे। छाया देखकर लोग बैठते भी थे।

क्या बोले ग्राम प्रधान
जर्जर भवन गांव से बाहर है, इसलिए भवन को ढहाने के लिए प्रस्ताव प्रशासन को नहीं भेजा। -ओम नारायण, ग्राम प्रधान

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1978 में बनी थी मिल, सात साल चली, फिर बंद हुई

ग्राम प्रधान के मुताबिक, बिलौझा ग्राम पंचायत में सन् 1978 में कानपुर से एक व्यापारी आया था। उसने यहां मानव संसाधन को देखते हुए सुबसा कताई मिल की स्थापना की थी। शुरू में मिल खूब चली। मिल में लगभग दो ढाई सौ लोग काम करते थे। सात साल तक मिल अच्छे से चली। इसी बीच साम्यवादी आंदोलन चला और 40 साल पहले व्यवसायी ने मिल बंद कर दी।
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