ढाब क्षेत्र की रेत पर बहता सोता का पानी।
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महिलाओं ने बयां किया अपना दर्द
गांव की बुजुर्ग महिलाएं शांति, दम्यंती, प्रमीला, हीरामनी आदि बताती हैं कि आदमी लोग जब दूसरे देश चले जाते हैं तो बहुत दुख होता है। उनके काम के बदले हमें कोई सुख-सुविधा या मुकम्मल सुरक्षा नहीं मिलती। गांव लौटने के बाद पुरुषों की जिंदगी सामान्य हो जाती है। गांव में ही कई लोग उनका चेहरा भूल जाते हैं। बेहतर रोजगार न मिलने के कारण दूसरे देश में जाकर काम तलाशना और करना यहां के लोगों की मजबूरी है।
गांव के ही कपिल देव, अनुज, वीरेंद्र, गुल्ला मल्लाह, शंकर निषाद, अर्जुन समेत कई लोग आज भी कतर देश में काम करते हैं। हर एक-दो दिन पर वे अपने परिवार का हाल पूछते हैं। चेहरे पर मुस्कान जरूर रहती है, लेकिन एक चिंता सताती रहती है। बच्चों की चिंता, हमसफर की चिंता, माता-पिता और भविष्य की चिंता को लेकर वे अपने काम में मशगूल रहते हैं।
ढाब क्षेत्र की भोगाैलिक जानकारी
साढ़े सात किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैले ढाब क्षेत्र की आबादी लगभग 52 हजार है, जिसमें यादव, मल्लाह, धोबी, गोसाई, मुसलमान, राजपूत और ब्राह्मण जाती के लोग मिलजुल कर रहते हैं। खास बात यह है कि यहां लगभग चार साैएकड़ खाली सरकारी जमीनें हैं। गांव के लोग इसको पर्यटन की दृष्टि से भी देखते हैं।
गांव का नाम - बाहर काम करने वालों की संख्या
नखवां - 67
मुस्तफाबाद - 120
रामचंदीपुर - 97
गोबरहां - 58
मोकलपुर - 22
रामपुर - 31
(यह आंकड़े स्थानीय लोगों ने उपलब्ध कराएं हैं, जो अनुमानित हैं।)