मुख्य रचनाएं-
संसद से सड़क तक
कल सुनना मुझे
धमिल की कविताएं
किस्सा जनतंत्र
मोचीराम
धूमिल की कविता में मिलता है सच का सबूत
साहित्यिक संस्था चिंतन के फेसबुक पेज पर कवि सुदामा पांडेय धूमिल की पुण्यतिथि की पूर्व संध्या पर आयोजित व्याख्यान में उनकी कविताओं पर प्रकाश डाला गया। बीएचयू हिंदी विभाग के प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि धूमिल की कविताओं में सच का सबूत देखने को मिलता है। कविताओं को उन्होंने बनारस के खेवली में रहकर लिखा। उनकी कविताओं में गांव की मिट्टी के हरियाली का छंद है जहां घास सदियों से अपने रौंदे जाने का इतिहास कहती है।
बसंत व बनारस उनकी कविताओं का प्राण तत्व है। प्रो. शुक्ल ने कविता मोचीराम, पटकथा और सुदामा पांडेय का प्रजातंत्र के बहाने कहा कि हमारे समय की छाई धुंध के भीतर धूमिल शब्द ज्योति की तरह हैं, जिनमें किसान व ग्रामीण जीवन की विविध अभिव्यक्तियां मिलती हैं। धूमिल खेतों की आवाज की पुनर्ववापसी के कवि रहे हैं जो जनता के संघर्ष को स्वर देते हैं। उन्होंने धूमिल को संकट के पहचान के कवि के रूप में याद किया और कहा कि धूमिल हर तरह की फुसफुसाहट के खिलाफ बगावत की आवाज थे।