वाराणसी। संत मोरारी बापू ने मंगलवार को सहज-असहज और सत्य-असत्य के अंतर को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि सरल बोलने और सहजता से जीने में जो आनंद है वो किसी में नहीं। सहज कार्य को पुण्य और असहज कर्म को उन्होंने पाप की संज्ञा दी।
अस्सी घाट के पास लगे एक लाख स्क्वायर फीट के भव्य पंडाल में संगीतमय रामकथा के चौथे दिन उन्होंने सत्य, प्रेम और करुणा की व्याख्या की। रामकथा में महाभारत कथा के भी प्रसंगों पर उन्होंने चर्चा की।
ज्ञान के रस से भरी उनकी तिजोरी से निकलते एक-एक शब्द कथा प्रेमियों के जेहनोदिल को छू जाने वाले थे। आम आदमी की समस्याओं और परिस्थितियों पर गजलों के शेर पढ़ कर वो माहौल को कभी संजीदा बना रहे थे तो कभी ठहाके गूंजने लगे थे। उन्होंने शेर पढ़ा-यूं तो मैं सुकरात नहीं था/ जहर बचा था क्या करता...।
मजा देख मियां सच बोलने का/ जिधर तूं है वहां कोई नहीं...। बापू के मुंह से निकले ऐसे शेर कथा प्रेमियों के दिल को छू जाने वाले थे। संत ने कहा कि मनुष्य कभी पूर्ण नहीं हो सकता। पूर्ण सिर्फ ब्रह्म होता है। इसलिए आदमी को आदमी बने रहने में ही भलाई है। बताया कि संसार में जो कुछ भी है वो सब महाभारत में है।
उन्होंने कहा कि सत्य किसी द्वंद में नहीं रह सकता। इससे पहले व्यास पीठ की पूजा कुंवर अनंत नारायण सिंह, केएन गोविंदाचार्य, चंद्रशेखर, केशव जालान, सूर्यकांत जालान, कृष्ण कुमार जालान, अखिलेश खेमका, अभिषेक जालान ने की।