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कल से सोरहिया मेला: संतान की दीर्घायु और समृद्धि के लिए लक्ष्मीकुंड पर उमड़ेगा आस्था का सैलाब

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वाराणसी। लक्सा स्थित प्राचीन लक्ष्मीकुंड मंदिर पर शुक्रवार से 16 दिवसीय सोरहिया मेला शुरू होने जा रहा है। इसके लिए तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। मंदिर के रंग रोगन के साथ-साथ कुंड के आसपास सफाई व्यवस्था को दुरुस्त किया गया है। काशी का सोरहिया मेला अपनी परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है।
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यहां महिलाएं गंगा की पवित्र मिट्टी से तैयार माता लक्ष्मी के मुखौटे को विग्रह से स्पर्श कराकर घर लाती हैं। इसे वर्षभर पूजागृह में स्थापित रखा जाता है और पिछले वर्ष के मुखौटे को लक्ष्मीकुंड या गंगा में विसर्जित कर दिया जाता है। भाद्रपद शुक्ल की अष्टमी तिथि को पड़ने वाले सोरहिया मेले में काशी के अलावा आसपास के जिलों से भी महिलाएं आएंगी। महिलाएं संतान की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और परिवार में सुख-समृद्धि की कामना के लिए महिलाएं 16 दिनों तक चलने वाले इस कठिन महालक्ष्मी व जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत का संकल्प लेंगी। सोरहिया मेले में भोर में मंगला आरती के साथ ही मां लक्ष्मी की आराधना शुरू हो जाती है। मंदिर परिसर में पांव रखने की भी जगह नहीं होती है। काशी की संकरी गली में मौजूद मंदिर अपनी आध्यात्मिकता के कारण प्रसिद्ध है। वर्ष में एक बार मां लक्ष्मी के साथ भगवान विष्णु के दर्शन को भीड़ उमड़ती है।
लक्ष्मी मंदिर के महंत पं. शिव प्रसाद पांडेय (लिंगिया महाराज) बताते हैं कि अष्टमी तिथि 18 सितंबर को दोपहर 12:16 बजे से शुरू हो रही है। पूरे 16 दिन अनुष्ठान करने वाली व्रती 18 सितंबर से व्रत रखेंगी, जबकि केवल पहले और आखिरी दिन व्रत रखने वाली महिलाएं उदयातिथि के अनुसार 19 सितंबर से संकल्प लेंगी। पितृपक्ष की अष्टमी यानी 3 अक्तूबर को निर्जला जीवित्पुत्रिका व्रत रखा जाएगा। 4 अक्तूबर को सुबह 7:28 बजे के बाद पारण के साथ 16 दिनी अनुष्ठान पूर्ण होगा। इसी दिन माता महालक्ष्मी का भव्य शृंगार भी किया जाएगा।
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नवविवाहिताओं के लिए इस साल रोक इस वर्ष अधिकमास (मलमास) का प्रभाव रहने के कारण नवविवाहित महिलाओं द्वारा इस व्रत की नई शुरुआत करने पर रोक रहेगी। धार्मिक मान्यताओं के तहत मलमास के वर्ष में कोई नया दीर्घकालीन व्रत प्रारंभ नहीं किया जाता, इसलिए नवविवाहिताएं आगामी वर्ष से यह अनुष्ठान शुरू कर सकेंगी।
16 की संख्या का विशेष महत्व
इस अनुष्ठान में 16 के अंक का मुख्य विधान है। कुंड में स्नान के बाद 16 बार आचमन और मंदिर की 16 परिक्रमा की जाती है। कलाई पर 16 गांठों वाला रक्षासूत्र बांधा जाता है। पूजन सामग्री में 16 अक्षत (चावल के दाने) और 16 दूर्वा को वस्त्र में बांधकर प्रतिदिन अर्पित किया जाता है। व्रती महिलाएं प्रतिदिन मंदिर प्रांगण में स्थापित जिउतिया माता का पूजन कर राजा जीमूतवाहन की पावन कथा सुनेंगी।
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