अस्पताल से सुपरस्पेशियलिटी तक वृद्ध महिला को ले जाने में परिजनाें को आधा घंटा लग गया। जबकि दूरी केवल 150 मीटर है। गिरधारी के अनुसार, चार बार दस-दस मिनट आराम के बाद किसी तरह 40 मिनट में मां को लेकर एसएसबी पहुंचे। वहां डॉक्टर ने नेफ्रोलॉजी विभाग का मामला न होने की बात कहकर फिर ऑन्कोलॉजी में जाने की सलाह दी।
बताया कि मां को लेकर फिर अस्पताल जाने की चिंता सताने लगी। किसी तरह पोते के पास दादी को छोड़कर एसएसबी इमरजेंसी के बाहर स्ट्रेचर वाले स्थान पर पहुंचा। वहां आठ से दस स्ट्रेचर थे। कर्मचारी को समस्या बताई और नियमानुसार आधार कार्ड भी दिया, लेकिन स्ट्रेचर नहीं मिला। हारकर मां कोे पैदल ही लेकर अस्पताल की ओर जाना पड़ा। ऐसा पहले मामला नहीं है। पहले भी एक बेटा मां को पीठ पर लादकर ले जाते दिखा था।
बीएचयू अस्पताल में निजी एंबुलेंस चालकों द्वारा कमीशन के चक्कर में मरीजों को गुमराह करने के विरोध में छात्रों का गुस्सा फूट पड़ा। दोपहर में छात्रों ने सिंहद्वार बंद कर प्रदर्शन किया। इस दौरान सर सुंदरलाल अस्पताल प्रशासन पर एंबुलेंस कर्मियों को संरक्षण देने का आरोप लगाया। उधर, सिंहद्वार बंद होने की सूचना पर बीएचयू प्रॉक्टोरियल बोर्ड के साथ ही भेलूपुर एसीपी प्रवीण कुमार, इंस्पेक्टर लंका फोर्स के साथ पहुंचे। छात्रों को समझा बुझाकर मामले को शांत कराया और एसीपी के आश्वासन पर छात्रों ने धरना समाप्त किया।
छात्रों ने बताया कि बीएचयू स्थित सर सुंदरलाल अस्पताल की इमरजेंसी और उसके आसपास निजी एंबुलेंस चालकों के साथ कमीशनखोरों का जमावड़ा रहता है। जिसकी वजह से दूरदराज से आए गरीब मरीजों का ठीक इलाज नहीं मिल पाता। अस्पताल प्रशासन से कई बार लिखित शिकायत की गई, लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।
दो से तीन बार आरोपियों को पकड़कर चीफ प्रॉक्टर के हवाले किया, लेकिन कार्रवाई के बजाय उन्हें छोड़ दिया गया। छात्रों ने बताया कि पिछले दिनों एक साथी अपने परिजन को अस्पताल में दिखाने पहुंचा। एक कमीशनखोर ने उसे पहचान लिया और उसके साथ मारपीट की। पुलिस भी साथी को लेकर लंका थाने चली गई। छात्र अपने साथी को छुड़ाने और दलालों पर कड़ी कार्रवाई की मांग पर अड़े रहे। उनका कहना था कि छात्र को थाने से छोड़ा जाए और उसके ऊपर लगी धाराओं को हटाया जाए।