श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के पूर्व अध्यक्ष एवं प्रख्यात ज्योतिषविद् प्रो. नागेंद्र पांडेय ने बताया कि इस बार पुरुषोत्तमी अमावस्या पर दुर्लभ और पवित्र संयोग बन रहा है। इस दिन स्नान, दान और पितरों के तर्पण का विशेष महत्व है।
इस विशिष्ट योग में पूजा-अर्चना करने का फल कई गुना बढ़ जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पीपल और बरगद के वृक्ष की पूजा तथा परिक्रमा करेंगी। मान्यता है कि पीपल वृक्ष की पूजा और उसकी परिक्रमा करने से सौभाग्य में वृद्धि होती है तथा दांपत्य जीवन सुखमय रहता है।
उन्होंने बताया कि शिव मंदिरों में भगवान शिव का जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करने से सभी कष्ट दूर होते हैं और ग्रह बाधाओं से मुक्ति मिलती है। मलमास में सोमवती अमावस्या का यह महासंयोग तीन दशक बाद आया है। इससे पहले ऐसा संयोग आषाढ़ मास के अधिकमास में 15 जुलाई 1996 को पड़ा था।
पूजन के लिए अमृतकाल मुहूर्त सुबह 6:15 बजे से 7:55 बजे तक तथा सुबह 9 बजे से दोपहर 12:20 बजे तक रहेगा। बड़ी शीतला मंदिर के महंत शिव प्रसाद पांडेय 'लिंगिया' ने बताया कि पुरुषोत्तमी अमावस्या का मलमास में पड़ना अत्यंत दुर्लभ है। काशी में इस तिथि पर कपिलधारा में पितरों का तर्पण करने से गया तीर्थ के समान फल प्राप्त होता है।
सुहागिन महिलाएं पीपल और बरगद के वृक्ष की पूजा कर अखंड सौभाग्य की कामना करेंगी।मंगला गौरी मंदिर के महंत नारायण गुरु ने बताया कि मलमास की अमावस्या पर कपिलधारा में पितरों का तर्पण करना सबसे अधिक फलदायी माना गया है। इससे पितर प्रसन्न होते हैं और अपने वंशजों के कष्ट दूर कर उन्हें विभिन्न बाधाओं से मुक्ति प्रदान करते हैं।
इस दुर्लभ योग में करें ये पूजा
अमावस्या तिथि पर भगवान शिव की आराधना करें। शिवलिंग पर जल, दूध, दही और शहद अर्पित कर मंत्र जाप करें। पीपल वृक्ष की जड़ में जल चढ़ाएं और उसके चारों ओर सात बार परिक्रमा करें। पितरों का तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करें। गरीबों और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र अथवा धन का दान करें।