शास्त्रीय गायिका पद्मश्री शुभा मुद्गल
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संगीत साध्य नहीं साधना है, जो भौतिकता से आध्यात्मिकता की ओर खींच ले जाती है। इस बात को शास्त्रीय गायिका पद्मश्री शुभा मुद्गल से बेहतर कौन जान सकता है। उनके संगीतमयी व्यक्तित्व में ख्याल, ठुमरी और दादरा का ऐसा संगम है जिससे साक्षात्कार करने वाले हर श्रोता का हृदय एक अनूठी अनुभूति से भर जाता है।
इनके गीत में शास्त्रीय संगीत के रस मिलते हैं तो पॉप म्यूजिक में भी इनका कोई सानी नहीं। ‘प्यार के गीत सुना जा रे...’ ‘अली मोरे अंगना...’ ‘मन के मंजीरे...’से लेकर ‘अब के सावन ऐसे बरसे...’ गीतों की रवानी और ताजगी आज भी वैसी की वैसी है जो संगीत प्रेमियों के दिलों पर छाई है।
एक कार्यक्रम के सिलसिले में काशी आईं शुभा मुद्गल का मानना है कि संगीत की विधा में हमेशा विद्यार्थी के रूप में रहना चाहिए। हमेशा कुछ अलग सीखने, करने की ललक मन में होनी चाहिए। शास्त्रीय संगीत के साथ ही बॉलीवुड में अपनी एक खास पहचान बना चुकीं शुभा मुद्गल कहती हैं कि आज नवोदित कलाकारों का भविष्य फिल्म में नहीं है।
उनका मानना है कि फिल्मों में अब शास्त्रीय संगीत का भविष्य नहीं है। कहती हैं कि पहले संगीत निर्देशक शास्त्रीय संगीत में निपुण थे। इसका प्रभाव पहले फिल्मों पर दिखता था लेकिन आज तकनीकी और अन्य संसाधनों के प्रयोग के चलते शास्त्रीय संगीत की फिल्मों में उपयोगिता कम हुई है।
हिंदुस्तानी शास्त्रीय के साथ फिल्मों में बतौर पार्श्वगायिका अपनी पहचान बना चुकीं शुभा मुद्गल कहती हैं कि संगीत में बनारस घराने का बड़ा योगदान है। यहां के कलाकारों की विश्व भर में मान्यता है। पंडित किशन महाराज, ठुमरी साम्राज्ञी गिरिजा देवी, पंडित जसराज, पंडित राजन साजन मिश्र ने इस घराने को विश्व फलक पर पहुंचाया है और ये परंपरा ऐसी ही बनी रहनी चहिए।
उनका मानना है कि पारंपरिक शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रहे विद्यार्थियों के लिए यह संघर्ष का समय है। सिर्फ इसके जरिये आजीविका चलाना मुश्किल है। ऐसे में जरूरी है कि हम जो कर रहे हैं उसमें नयापन लाएं। इसमें कोई बुराई नहीं है। संगीत के साथ प्रयोग करते रहना चाहिए।
रामरंग की जयंती पर गायन, वादन की झलक
बीएचयू के पंडित ओंकारनाथ ठाकुर प्रेक्षागृह में कार्यक्रम आयोजित
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बीएचयू के संगीत एवं मंच कला संकाय में शनिवार को पंडित रामाश्रय झा रामरंग की जयंती संगीत उत्सव के रुप में मनाई गई। इस दौरान जाने माने कलाकारों ने अपने गायन-वादन के जरिए रामरंग को याद किया। एकल वादन में पंडित सुधीर नायक ने हारमोनियम तो डॉ. अनिश प्रधान ने तबले की थाप के जरिए लोगों के दिल में जगह बनाई।
पंडित ओंकारनाथ ठाकुर सभागार में आयोजित कार्यक्रम की शुरूआत हारमोनियम वादक सुधीर नायक के वादन से हुई। इसमें उन्होंने राग जावटी में विलंबित ख्याल, मध्यलय तीन ताल प्रस्तुत किया। इसके बाद राग तिलक देश में रचना प्रस्तुत की और अंत में सावन के महीने में कजरी की धुन सुनाकर लोगों की तालियां बटोरी।
उधर एकल तबला वादन डॉ. अनिश ने तीन ताल में परंपरागत वंदिश, पेशकार, कायदा रेला, गत टुकड़ा बजाया। कार्यक्रम के अंत में पद्मश्री शुभा मदगल ने विलंबित एक ताल में बंदीश मन में तु राम-तीर से गायन की शुरूआत की। इसके बाद उन्होंने द्रुत एक ताल में सांझ कि भई-देवी दयानी दानी गाकर दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया। इसके पहले रामरंग पर लिखी पुस्तक का विमोचन भी शुभा मदगल, प्रो. राजेश शाह, डॉ. रामशंकर आदि ने किया।